कमलाकांत पांडेय: 1990 में अयोध्या गए कारसेवक, जिनका परिवार आज तक करता रहा इंतजार
प्रयागराज के खिदिरपुर निवासी कमलाकांत पांडेय 1990 में अयोध्या गए थे। परिवार के मुताबिक, उनकी पत्नी ने वर्षों तक उनकी तलाश की, लेकिन उनका शव कभी नहीं मिला।

1990 में अयोध्या गए प्रयागराज निवासी कारसेवक कमलाकांत पांडेय और उनके परिवार की कहानी
प्रयागराज
2:28 PM, Nov 4, 2026
O News हिंदी Desk
राम-राम का जयघोष करते अयोध्या गए थे कमलाकांत पांडेय, फिर कभी घर नहीं लौटे
प्रयागराज के खिदिरपुर गाँव के कमलाकांत पांडेय 1990 में राम मंदिर आंदोलन के दौरान अयोध्या गए थे। परिवार के मुताबिक, उनके जाने के बाद पत्नी ने वर्षों तक अधिकारियों के दफ्तरों और अयोध्या की गलियों में उनकी तलाश की, लेकिन उन्हें पति का शव तक नहीं मिला।
प्रयागराज जिले के खिदिरपुर गाँव में रहने वाले कमलाकांत पांडेय के परिवार को उम्मीद थी कि वह दो दिन में घर लौट आएँगे। अक्टूबर 1990 में अयोध्या के लिए निकलते समय उन्होंने परिवार से यही कहा था। मगर वह यात्रा उनकी आखिरी साबित हुई। परिवार का कहना है कि उसके बाद कमलाकांत का कोई पता नहीं चला।
कमलाकांत की कहानी उनके बेटे शिवभूषण पांडेय की यादों और परिवार को मिले कुछ पुराने पत्रों के जरिए सामने आती है। एक प्रकाशित रिपोर्ट में भी उनके परिवार से बातचीत और इस घटना से जुड़े विवरण दर्ज हैं। hindi.opindia.com
कौड़िहार में पान खाकर अयोध्या के लिए हुए रवाना
कमलाकांत प्रयागराज के नवाबगंज थाना क्षेत्र के खिदिरपुर गाँव के रहने वाले थे। परिवार के मुताबिक, वह उत्तर प्रदेश होमगार्ड विभाग में काम कर चुके थे। अयोध्या जाने से कुछ समय पहले उन्होंने नौकरी छोड़ दी थी।
कौड़िहार बाजार के पास रहने वाले रामेश्वर प्रसाद उपाध्याय, जिन्हें लोग लल्लू के नाम से भी जानते थे, ने बताया कि कमलाकांत से उनकी आखिरी मुलाकात 28 अक्टूबर को हुई थी। दोनों ने साथ बैठकर पान खाया। फिर कमलाकांत अयोध्या की ओर रवाना हो गए। उस समय किसी को अंदाजा नहीं था कि यह उनकी आखिरी मुलाकात होगी।
पति की तलाश में बार-बार अयोध्या पहुँचीं पत्नी
कमलाकांत के घर न लौटने पर उनकी पत्नी ने पहले अधिकारियों से संपर्क किया। बेटे शिवभूषण के अनुसार, परिवार ने उस समय जिलाधिकारी से लेकर मुख्यमंत्री तक को पत्र भेजे थे। शिवभूषण तब छोटे थे, लेकिन उन्हें अपनी माँ का इंतजार और परेशानियाँ अब भी याद हैं।
परिवार का कहना है कि कमलाकांत की पत्नी कई बार अयोध्या गईं। वह अस्पतालों, गलियों, नदी-तालाबों और श्मशान घाटों के आसपास पति को खोजती रहीं। उन्हें न कमलाकांत जीवित मिले, न उनका शव। प्रयागराज से अयोध्या तक आने-जाने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं होते थे, इसलिए कभी उधार लेना पड़ता और कभी पैदल चलना पड़ता था।
उनकी पत्नी ने परिवार की जिम्मेदारी अकेले सँभाली। शिवभूषण के मुताबिक, परिवार में तीन बेटे और दो बेटियाँ थीं। घर चलाने के लिए उनकी माँ ने आंगनबाड़ी में काम किया और खेती भी सँभाली। बीमारी के बाद 2022 में उनका निधन हो गया। वह पति की वापसी की उम्मीद आखिरी समय तक लगाए रहीं।
बेटे ने बाद में जुटाईं पिता के बारे में जानकारियाँ
शिवभूषण बताते हैं कि बड़े होने पर उन्होंने अपने पिता के बारे में जानकारी जुटानी शुरू की। परिवार को कुछ ऐसे लोग मिले जो उसी जत्थे के साथ अयोध्या गए थे। उनके बताए विवरण के अनुसार, 30 अक्टूबर 1990 को कमलाकांत राम-राम कहते हुए जन्मभूमि की ओर बढ़ रहे थे।
परिवार को सुनाई गई इस घटना की कहानी में कहा गया कि पुलिस की वर्दी पहने लोगों ने जत्थे को रोककर राम का नाम न लेने की चेतावनी दी। कमलाकांत कथित तौर पर राम-राम कहते रहे। शिवभूषण के अनुसार, उन लोगों ने बताया कि उनके पिता के मुँह में लाठी डालकर उन्हें चुप कराने की कोशिश की गई। फिर गोली लगने के बाद उन्हें सड़क पर घसीटकर ले जाया गया।
ये विवरण परिवार को बाद में मिले मौखिक बयानों पर आधारित हैं। कमलाकांत का शव परिवार को नहीं मिला और उपलब्ध सामग्री से घटना के हर पहलू की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो पाती। इसलिए इन आरोपों को परिवार के बताए बयान के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
परिवार के लिए मंदिर निर्माण बना भावनात्मक पड़ाव
कमलाकांत के परिवार का जीवन आसान नहीं रहा। बेटे शिवभूषण के मुताबिक, परिवार खेती और निजी कामों से गुजारा करता है। हाल के वर्षों में उन्होंने कर्ज लेकर कच्चे घर की जगह पक्का मकान बनवाया।
राम मंदिर निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा परिवार के लिए भावनात्मक महत्व रखती है। शिवभूषण ने कहा कि उनके माता-पिता का सपना पूरा होने से परिवार को संतोष मिला। उन्होंने इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आभार जताया।
कमलाकांत पांडेय का परिवार आज भी उस सवाल के साथ जी रहा है जिसका जवाब उसे कभी नहीं मिला—वह अयोध्या से लौटे क्यों नहीं, और उनके साथ आखिर हुआ क्या था? परिवार की यादों में उनकी अंतिम विदाई कौड़िहार में पान की उस मुलाकात से जुड़ी है, जिसके बाद वह घर वापस नहीं आए।
संपादकीय नोट: इस लेख में घटना से जुड़े विवरण परिवार के बयानों पर आधारित हैं। जहाँ स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है, वहाँ संबंधित बातों को परिवार के दावे के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
Source: O News Hindi


