बंगाल में चुनाव से पहले 'छावनी' जैसी तैयारी: 480 कंपनियां तैनात, क्या ममता सरकार पर मंडरा रहा है राष्ट्रपति शासन का साया?
"Ahead of West Bengal Assembly Election 2026, the EC deploys 480 CAPF companies by March 10. Is President's Rule likely in Bengal? Get the latest updates on security measures, sensitive zones, and the political impact of this massive deployment."

क्या ममता सरकार पर मंडरा रहा है राष्ट्रपति शासन का साया?
west bengal
10:51 AM, Feb 25, 2026
O News हिंदी Desk
पश्चिम बंगाल चुनाव 2026: चुनाव से पहले ही छावनी बना बंगाल, क्या राज्य में लगने वाला है राष्ट्रपति शासन?
West Bengal Assembly Election 2026: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की रणभेरी बजने ही वाली है, लेकिन चुनाव की तारीखों के औपचारिक ऐलान से पहले ही दिल्ली से लेकर कोलकाता तक हलचल तेज हो गई है। चुनाव आयोग (Election Commission) ने एक बड़ा और अभूतपूर्व कदम उठाते हुए 10 मार्च तक राज्य में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) की 480 कंपनियां तैनात करने का फैसला किया है।
इस भारी तैनाती के बाद गलियारों में एक ही सवाल गूंज रहा है— क्या बंगाल में राष्ट्रपति शासन (President's Rule) लगने वाला है? आइए, इस पूरी स्थिति का गहराई से विश्लेषण करते हैं।
1. चुनाव से पहले 'सुपर एक्टिव' मोड में चुनाव आयोग
आमतौर पर केंद्रीय बलों की तैनाती चुनाव की तारीखों की घोषणा और आचार संहिता लागू होने के बाद होती है। लेकिन बंगाल के मामले में आयोग ने "प्रिवेंटिव एक्शन" (निवारक कार्रवाई) शुरू कर दी है।
- दो चरणों में तैनाती: 1 मार्च तक 240 कंपनियां और 10 मार्च तक शेष 240 कंपनियां बंगाल पहुँच जाएंगी।
- मकसद: आयोग का कहना है कि इन बलों का उपयोग 'एरिया डोमिनेशन' यानी क्षेत्र पर नियंत्रण और मतदाताओं में सुरक्षा की भावना पैदा करने के लिए किया जाएगा।
- संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान: पुलिस-प्रशासन को मार्च के दूसरे सप्ताह तक उन इलाकों की लिस्ट सौंपने को कहा गया है जहाँ हिंसा की आशंका सबसे अधिक है।
2. क्या 480 कंपनियों की तैनाती राष्ट्रपति शासन का संकेत है?
सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं में यह बात तेजी से फैल रही है कि इतनी बड़ी संख्या में फोर्स का आना राष्ट्रपति शासन की भूमिका हो सकता है। हालांकि, इसे तकनीकी और संवैधानिक नजरिए से समझना जरूरी है।
धारा 356 और बंगाल की स्थिति
भारतीय संविधान की धारा 356 के तहत राष्ट्रपति शासन तब लगाया जाता है जब राज्य की संवैधानिक मशीनरी पूरी तरह विफल हो जाए।
- तर्क पक्ष में: विपक्ष (विशेषकर भाजपा) अक्सर आरोप लगाता है कि बंगाल में कानून-व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है और निष्पक्ष चुनाव राज्य पुलिस के भरोसे संभव नहीं है।
- तर्क विपक्ष में: वर्तमान में चुनी हुई सरकार सत्ता में है। केवल फोर्स की तैनाती को राष्ट्रपति शासन का आधार नहीं माना जा सकता। चुनाव आयोग एक स्वतंत्र निकाय है, और उसका प्राथमिक लक्ष्य 'हिंसा मुक्त चुनाव' कराना है, न कि सरकार गिराना।
सच तो यह है कि: चुनाव आयोग की यह सक्रियता 2021 के विधानसभा चुनाव और उसके बाद हुए पंचायत चुनावों में हुई हिंसा के कड़वे अनुभवों का परिणाम है। आयोग इस बार कोई जोखिम नहीं लेना चाहता।
3. बलों का गणित: कौन-कौन सी फोर्स होगी तैनात?
बंगाल की सीमाओं और आंतरिक सुरक्षा के लिए पांच अलग-अलग सुरक्षा बलों को मोर्चे पर लगाया जा रहा है।
4. ग्राउंड जीरो पर क्या होगा असर?
10 मार्च तक जब 480 कंपनियां बंगाल की सड़कों पर मार्च करेंगी, तो इसके तीन बड़े मनोवैज्ञानिक असर होंगे:
- उपद्रवियों में डर: चुनाव से पहले हिंसा की साजिश रचने वाले तत्वों पर लगाम लगेगी।
- मतदाताओं में विश्वास: आम आदमी बिना किसी डर के पोलिंग बूथ तक जाने का साहस जुटा पाएगा।
- पुलिस की भूमिका: राज्य पुलिस को अब केंद्रीय पर्यवेक्षकों (Central Observers) के सीधे समन्वय में काम करना होगा, जिससे पक्षपात की गुंजाइश कम हो जाती है।
5. राजनीतिक प्रतिक्रियाएं: आरोप और प्रत्यारोप
बंगाल में फोर्स की एंट्री पर राजनीति गरमा गई है।
- तृणमूल कांग्रेस (TMC): सत्ताधारी दल का कहना है कि यह राज्य के अधिकारों का हनन है और केंद्र सरकार केंद्रीय एजेंसियों के जरिए डराने की कोशिश कर रही है।
- भाजपा (BJP): विपक्षी दल ने इसका स्वागत करते हुए कहा है कि बंगाल के लोग अब चैन की सांस ले पाएंगे और 'दीदी' के राज में जो डर का माहौल था, उसे ये जवान खत्म करेंगे।
6. निष्कर्ष: राष्ट्रपति शासन या निष्पक्ष चुनाव की तैयारी?
फिलहाल की स्थिति को देखकर यह कहना जल्दबाजी होगी कि राष्ट्रपति शासन लगने वाला है। अभी तक की सारी गतिविधियां 'स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव' के संवैधानिक ढांचे के भीतर हैं। चुनाव आयोग का मुख्य फोकस इस बार "जीरो टॉलरेंस टू वायलेंस" (हिंसा के प्रति शून्य सहनशीलता) पर है।
हालांकि, यदि चुनाव की प्रक्रिया के दौरान कानून-व्यवस्था और बिगड़ती है, तो राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार भविष्य में कोई भी कड़ा फैसला ले सकती है। लेकिन फिलहाल, यह 480 कंपनियां किसी 'शासन परिवर्तन' के लिए नहीं, बल्कि 'लोकतंत्र की सुरक्षा' के लिए भेजी जा रही हैं।
आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि बंगाल में बिना राष्ट्रपति शासन के शांतिपूर्ण चुनाव संभव हैं? हमें कमेंट में जरूर बताएं।
Source: Onewshindi


