राम-कृष्ण को भगवान न मानने की प्रतिज्ञा पर घिरे SP प्रवक्ता Rajkumar Bhati, BJP ने Akhilesh Yadav से मांगा जवाब
सपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजकुमार भाटी का राम-कृष्ण को भगवान न मानने वाली प्रतिज्ञाएं दोहराते वीडियो वायरल होने के बाद विवाद तेज हो गया है। BJP ने अखिलेश यादव से सपा का रुख स्पष्ट करने की मांग की है। पढ़ें पूरा मामला और भाटी की सफाई।

सपा प्रवक्ता राजकुमार भाटी के राम-कृष्ण से जुड़े वायरल वीडियो पर BJP ने अखिलेश यादव से मांगा जवाब
उत्तर प्रदेश
2:07 PM, Oct 22, 2026
O News हिंदी Desk
राम-कृष्ण को भगवान न मानने की प्रतिज्ञा पर घिरे सपा प्रवक्ता राजकुमार भाटी, BJP ने अखिलेश यादव से पूछे सवाल
लखनऊ/नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की ओर बढ़ रही राजनीति के बीच आस्था और सनातन को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजकुमार भाटी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने सपा और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को घेरना शुरू कर दिया है।
वायरल वीडियो दिल्ली में आयोजित एक बौद्ध धम्म दीक्षा समारोह से जुड़ा बताया जा रहा है। कार्यक्रम में डॉ. भीमराव आंबेडकर से जुड़ी 22 प्रतिज्ञाएं दोहराई गईं और राजकुमार भाटी भी उन्हें दोहराते दिखाई दिए। इन्हीं प्रतिज्ञाओं में ब्रह्मा, विष्णु और महेश को न मानने के साथ राम और कृष्ण को भगवान न मानने तथा उनकी पूजा न करने की बात शामिल है।
वीडियो सामने आते ही राजनीतिक विवाद शुरू हो गया और भाजपा नेताओं ने सीधे समाजवादी पार्टी के नेतृत्व से जवाब मांगना शुरू कर दिया।
BJP का सवाल- क्या यही समाजवादी पार्टी की सोच है?
विवाद के बाद भाजपा नेता रोहन गुप्ता समेत पार्टी के कई नेताओं ने समाजवादी पार्टी पर सवाल उठाए हैं। भाजपा का आरोप है कि चुनाव के समय सपा नेतृत्व धार्मिक आयोजनों और भगवान राम-कृष्ण की चर्चा करता है, लेकिन पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता का वायरल वीडियो अलग संदेश देता दिखाई देता है।
इसी कारण भाजपा अब अखिलेश यादव से यह स्पष्ट करने की मांग कर रही है कि राजकुमार भाटी द्वारा दोहराई गई प्रतिज्ञाओं को लेकर समाजवादी पार्टी का आधिकारिक रुख क्या है।
राजनीतिक तौर पर यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि उत्तर प्रदेश की राजनीति में भगवान राम और भगवान कृष्ण केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि अयोध्या, मथुरा और प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान से भी गहराई से जुड़े हैं।
🚨 SHOCKING & SHAMEFUL Samajwadi Party spokesperson Rajkumar Bhati declares: “I will NOT ACCEPT Brahma, Vishnu, Mahesh, Ram or Krishna as Gods, nor will I worship them.” 🤯 => Is this the real face of SP’s ideology? https://t.co/Yb4xWHIGfW
— Megh Updates 🚨™ (@MeghUpdates) October 21, 2026
कुछ दिन पहले अयोध्या में राम-कृष्ण की बात कर रहे थे अखिलेश
इस विवाद का एक दिलचस्प राजनीतिक पहलू भी है।
अखिलेश यादव ने हाल ही में अयोध्या में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा से जुड़े कार्यक्रम में भगवान राम और भगवान कृष्ण का उल्लेख किया था। उन्होंने राम और कृष्ण को लेकर अपनी आस्था और सामाजिक समानता का संदेश दिया था।
अखिलेश यादव पहले भी सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि वह भगवान विष्णु को मानते हैं और राम तथा कृष्ण भगवान विष्णु के अवतार हैं।
ऐसे में राजकुमार भाटी के वायरल वीडियो ने भाजपा को सपा के भीतर धार्मिक आस्था को लेकर कथित विरोधाभास का मुद्दा उठाने का अवसर दे दिया है।
BJP इसी विरोधाभास को राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है—एक तरफ पार्टी अध्यक्ष द्वारा राम-कृष्ण की चर्चा और दूसरी तरफ राष्ट्रीय प्रवक्ता का ऐसी प्रतिज्ञाएं दोहराना जिनमें राम-कृष्ण को भगवान न मानने की बात शामिल है।
राजकुमार भाटी ने भी दी अपनी सफाई
हालांकि पूरे विवाद में राजकुमार भाटी का पक्ष जानना भी जरूरी है।
वीडियो वायरल होने के बाद भाटी ने धर्म परिवर्तन की बात से इनकार किया। उनका कहना है कि राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता होने के कारण वे विभिन्न धर्मों और समुदायों के कार्यक्रमों में शामिल होते रहते हैं।
उन्होंने कहा कि वे गुरुद्वारे जाते हैं, मुस्लिम समाज के कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं और पूजा-पाठ तथा यज्ञ-हवन जैसे आयोजनों में भी शामिल होते हैं।
इसलिए वायरल वीडियो के आधार पर उनके धर्म परिवर्तन का दावा करना सही नहीं होगा।
यानी विवाद के दो स्पष्ट पक्ष हैं। भाजपा इसे सपा की धार्मिक राजनीति पर सवाल उठाने का आधार बना रही है, जबकि भाटी इसे एक कार्यक्रम में सहभागिता से जुड़ा मामला बताते हुए सभी धर्मों के सम्मान की बात कर रहे हैं।
योगी की राजनीति में राम और कृष्ण की स्पष्ट जगह
इस विवाद के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की राजनीति और सपा की रणनीति के बीच वैचारिक अंतर पर भी बहस तेज हो सकती है।
योगी आदित्यनाथ ने अपने सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में सनातन परंपरा, भगवान राम और भगवान कृष्ण को अपनी राजनीति तथा सांस्कृतिक दृष्टिकोण में स्पष्ट स्थान दिया है।
अयोध्या में राम मंदिर, दीपोत्सव और धार्मिक-सांस्कृतिक पर्यटन के विस्तार से लेकर मथुरा-वृंदावन के विकास तक योगी सरकार ने धार्मिक स्थलों को प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान और पर्यटन अर्थव्यवस्था से जोड़ने का प्रयास किया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने भी अयोध्या, काशी सहित विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों के विकास को प्रमुखता दी है।
यही कारण है कि भाजपा इस विवाद को केवल एक नेता के वायरल वीडियो तक सीमित रखने के बजाय विचारधारा और सांस्कृतिक पहचान से जोड़ने का प्रयास कर सकती है।
इन्हें भी पढ़ें
आस्था बनाम राजनीति की बहस
हालांकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति को अपनी धार्मिक आस्था रखने या न रखने की स्वतंत्रता है। किसी व्यक्ति की निजी धार्मिक मान्यता अपने आप में अपराध या राजनीतिक अयोग्यता नहीं है।
लेकिन जब कोई व्यक्ति किसी राजनीतिक दल का राष्ट्रीय प्रवक्ता हो, तब सार्वजनिक मंच पर उसके बयान या प्रतिज्ञाएं राजनीतिक सवाल जरूर खड़े कर सकती हैं।
यही इस विवाद का केंद्रीय बिंदु है।
मामला इस बात का नहीं है कि किसी व्यक्ति को राम या कृष्ण को भगवान मानने के लिए बाध्य किया जा सकता है। असली राजनीतिक सवाल यह है कि क्या एक राष्ट्रीय प्रवक्ता की सार्वजनिक अभिव्यक्ति उसकी पार्टी की विचारधारा को भी दर्शाती है?
BJP इसी सवाल को अखिलेश यादव के सामने रख रही है।
2027 से पहले क्यों महत्वपूर्ण है यह विवाद?
उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आएगा, विकास, कानून-व्यवस्था, रोजगार, सामाजिक समीकरणों के साथ धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनेगी।
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और उसके बाद विकसित हुई नई राजनीतिक परिस्थितियों ने पहले ही उत्तर प्रदेश में आस्था से जुड़े मुद्दों को बेहद महत्वपूर्ण बना दिया है।
मथुरा और काशी भी लगातार राजनीतिक और सांस्कृतिक चर्चा के केंद्र में रहते हैं।
ऐसी परिस्थिति में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय स्तर के नेता से जुड़ा यह वायरल वीडियो भाजपा को बड़ा राजनीतिक मुद्दा उपलब्ध करा सकता है।
भाजपा की रणनीति संभवतः यह स्थापित करने की होगी कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति सनातन तथा भारतीय सांस्कृतिक पहचान को लेकर स्पष्ट है, जबकि विपक्ष इस मुद्दे पर अलग-अलग संदेश देता है।
सपा के सामने जवाब देने की चुनौती
इस विवाद का राजनीतिक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि समाजवादी पार्टी आगे क्या रुख अपनाती है।
यदि पार्टी इसे राजकुमार भाटी की व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता का मामला बताती है, तो भाजपा सवाल उठा सकती है कि राष्ट्रीय प्रवक्ता द्वारा सार्वजनिक मंच पर ली गई प्रतिज्ञाओं और पार्टी की आधिकारिक सोच के बीच सीमा कहां है।
दूसरी ओर, यदि सपा स्पष्ट करती है कि वह राम और कृष्ण सहित सभी धार्मिक आस्थाओं का सम्मान करती है, तो पार्टी विवाद को व्यक्तिगत अभिव्यक्ति तक सीमित करने का प्रयास कर सकती है।
खुद अखिलेश यादव के पुराने बयानों को देखें तो उन्होंने कई अवसरों पर राम और कृष्ण में अपनी आस्था व्यक्त की है। इसलिए यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा कि अखिलेश यादव स्वयं राम या कृष्ण को भगवान नहीं मानते।
यही वजह है कि खबर में राजकुमार भाटी की प्रतिज्ञा और अखिलेश यादव के व्यक्तिगत विचारों के बीच अंतर रखना जरूरी है।
योगी सरकार के लिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बड़ा राजनीतिक आधार
उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के राजनीतिक मॉडल में कानून-व्यवस्था और विकास के साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भी एक प्रमुख आधार रहा है।
अयोध्या का विकास हो, काशी का धार्मिक पर्यटन हो या ब्रज क्षेत्र को वैश्विक धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने का प्रयास—भाजपा इन कामों को अपनी सांस्कृतिक प्रतिबद्धता के प्रमाण के रूप में जनता के सामने रखती रही है।
प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी दोनों लगातार विकास और विरासत को साथ लेकर चलने की बात करते रहे हैं।
इसलिए राम-कृष्ण को लेकर खड़ा हुआ मौजूदा विवाद BJP के लिए अपनी इसी वैचारिक लाइन को और मजबूत तरीके से जनता के सामने रखने का अवसर बन सकता है।
अब अखिलेश यादव के जवाब पर नजर
फिलहाल राजकुमार भाटी वायरल वीडियो पर अपना पक्ष रख चुके हैं और धर्म परिवर्तन की बात से इनकार कर चुके हैं। इसके बावजूद राजनीतिक विवाद समाप्त होता दिखाई नहीं दे रहा।
भाजपा नेताओं का सवाल अब सीधे अखिलेश यादव से है—क्या समाजवादी पार्टी अपने राष्ट्रीय प्रवक्ता द्वारा दोहराई गई इन प्रतिज्ञाओं से सहमत है या नहीं?
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह विवाद कितनी दूर तक जाएगा, यह आने वाले दिनों में साफ होगा। लेकिन इतना तय है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में राम, कृष्ण, सनातन और सांस्कृतिक पहचान एक बार फिर सियासी बहस के केंद्र में आ गए हैं।
Source: O News हिंदी


