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आरक्षण लेने के बाद जनरल सीट नहीं: सुप्रीम कोर्ट का साफ संदेश

आरक्षण की छूट लेने वाले उम्मीदवार जनरल सीट के हकदार नहीं: IFS केस में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

आरक्षण लेने के बाद जनरल सीट नहीं: सुप्रीम कोर्ट का साफ संदेश

आरक्षण का फायदा लिया? तो जनरल सीट नहीं!

delhi

1:12 PM, Jan 7, 2026

O News हिंदी Desk

आरक्षण की छूट लेकर जनरल सीट पर दावा नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने ‘मेरिट बनाम रियायत’ की बहस पर लगा दी मुहर

नई दिल्ली: भारत में आरक्षण को लेकर दशकों से चल रही बहस एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद केंद्र में आ गई है। शीर्ष अदालत ने साफ शब्दों में कह दिया है कि जो उम्मीदवार परीक्षा के किसी भी चरण में आरक्षित श्रेणी की छूट (Relaxation) का लाभ उठाता है, वह बाद में अनारक्षित यानी जनरल सीट पर दावा नहीं कर सकता, भले ही अंतिम मेरिट लिस्ट में उसकी रैंक जनरल कैटेगरी के उम्मीदवार से बेहतर ही क्यों न हो।

यह फैसला न केवल भारतीय वन सेवा (IFS) 2013 परीक्षा से जुड़े एक मामले में आया है, बल्कि यह पूरे देश की सिविल सर्विस चयन प्रक्रिया, “मेरिट” की परिभाषा और “आरक्षण के दायरे” को लेकर एक बड़ा संवैधानिक संदेश भी देता है।

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क्या सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण खत्म कर दिया?

नहीं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह ज़रूर स्पष्ट कर दिया है कि आरक्षण का लाभ लेने और जनरल मेरिट का दावा करने—दोनों एक साथ नहीं चल सकते।

यह फैसला उन तर्कों पर करारा प्रहार है, जिनमें कहा जाता रहा है कि “अगर फाइनल मेरिट में नंबर ज़्यादा हैं, तो जनरल सीट मिलनी ही चाहिए”—भले ही शुरुआती चरण में रियायत ली गई हो।

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पूरा मामला क्या था? (IFS 2013 केस की पृष्ठभूमि)

यह विवाद 2013 की इंडियन फॉरेस्ट सर्विस (IFS) परीक्षा से जुड़ा है, जो UPSC द्वारा आयोजित होती है। इस परीक्षा में तीन चरण होते हैं:

  1. प्रारंभिक परीक्षा (Prelims)
  2. मुख्य परीक्षा (Mains)
  3. इंटरव्यू (Interview)

प्रारंभिक परीक्षा में कट-ऑफ:

  1. जनरल कैटेगरी: 267 अंक
  2. SC कैटेगरी: 233 अंक

उम्मीदवार कौन थे?

  1. जी. किरण (SC वर्ग): प्राप्त अंक: 247.18 SC कट-ऑफ (233) के कारण प्रीलिम्स पास
  2. एंटनी एस. मारियप्पा (जनरल वर्ग): प्राप्त अंक: 270.68 जनरल कट-ऑफ पार

दोनों ने आगे मेन परीक्षा और इंटरव्यू दिया।

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फाइनल मेरिट में क्या हुआ?

  1. जी. किरण: ऑल इंडिया रैंक 19
  2. एंटनी मारियप्पा: ऑल इंडिया रैंक 37

यानि फाइनल मेरिट में SC उम्मीदवार किरण की रैंक जनरल उम्मीदवार से बेहतर थी।

यहीं से विवाद शुरू हुआ।

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कैडर अलॉटमेंट ने विवाद को जन्म दिया

जब राज्य कैडर (State Cadre Allocation) की बारी आई, तो स्थिति कुछ इस तरह थी:

  1. कर्नाटक कैडर में: जनरल कैटेगरी के लिए 1 Insider सीट SC कैटेगरी के लिए 0 Insider सीट

सरकार ने नियमों के अनुसार:

  1. जनरल सीट → एंटनी मारियप्पा को
  2. जी. किरण → तमिलनाडु कैडर

किरण इससे असंतुष्ट हो गए।

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CAT और हाईकोर्ट ने क्या कहा?

किरण ने पहले CAT (Central Administrative Tribunal) और फिर कर्नाटक हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

दोनों ही संस्थाओं ने कहा:

“क्योंकि किरण की फाइनल मेरिट रैंक बेहतर है, इसलिए उन्हें जनरल सीट मिलनी चाहिए।”

यानी अदालतों ने फाइनल मेरिट को निर्णायक मान लिया और प्रारंभिक छूट को नजरअंदाज कर दिया।

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सरकार सुप्रीम कोर्ट क्यों पहुंची?

यूनियन ऑफ इंडिया ने इस फैसले को चुनौती दी और कहा:

  1. IFS चयन प्रक्रिया एकीकृत (Integrated) है
  2. Prelims में छूट लेकर Main/Interview तक पहुँचना भी चयन प्रक्रिया का हिस्सा है
  3. नियमों में साफ लिखा है कि छूट लेने वाला उम्मीदवार जनरल सीट के लिए पात्र नहीं होगा
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सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला क्यों पलटा?

जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा:

🔹 IFS नियम 14(ii) क्या कहता है?

केवल वही आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार अनारक्षित सीटों पर विचार के योग्य होंगे, जिन्होंने परीक्षा के किसी भी चरण में कोई छूट या रियायत न ली हो।

🔹 कोर्ट की सख्त टिप्पणी:

“एक बार जब आरक्षित श्रेणी का उम्मीदवार छूट का लाभ ले लेता है, तो वह अनारक्षित रिक्तियों के लिए पात्र नहीं रह जाता।”

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‘मेरिट’ की नई व्याख्या नहीं, बल्कि सही व्याख्या

यह फैसला कोई नया सिद्धांत नहीं गढ़ता, बल्कि पुराने संवैधानिक सिद्धांतों को दोहराता है।

सुप्रीम कोर्ट ने Union of India vs Saajid Roy केस का हवाला देते हुए कहा:

  1. उम्र, कट-ऑफ, प्रयास या किसी भी स्तर पर मिली छूट— अगर ली गई है, तो अनारक्षित सीट का दावा नहीं बनता
  2. जब तक नियम स्पष्ट अनुमति न दें
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क्यों यह फैसला ऐतिहासिक है?

1️⃣ ‘दो नाव पर पैर’ वाली सोच पर रोक

अब यह तर्क नहीं चलेगा कि:

“प्रीलिम्स में आरक्षण, लेकिन फाइनल में जनरल मेरिट”

2️⃣ जनरल कैटेगरी के उम्मीदवारों को न्याय

यह फैसला उन लाखों छात्रों के लिए राहत है जो बिना किसी छूट के हर स्तर पर ऊंची कट-ऑफ झेलते हैं।

3️⃣ आरक्षण बनाम बराबरी की बहस में स्पष्टता

आरक्षण सहायता है, समान प्रतिस्पर्धा का प्रमाणपत्र नहीं—कोर्ट ने यह संदेश साफ दिया।

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क्या यह फैसला आरक्षण विरोधी है?

बिल्कुल नहीं।

यह फैसला:

  1. आरक्षण को खत्म नहीं करता
  2. SC/ST/OBC अधिकारों को नहीं छीनता
  3. बल्कि आरक्षण के दायरे को स्पष्ट करता है

कोर्ट ने कहा:

“आरक्षण का लाभ लेने वाला व्यक्ति, उसी श्रेणी में रहेगा— यह ही न्यायसंगत है।”

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आने वाले समय में क्या असर होगा?

  1. UPSC, State PSC, SSC जैसी परीक्षाओं में जनरल सीट पर दावा करने के नियम और सख्त होंगे
  2. कोर्ट में चल रहे कई समान मामलों में यह फैसला नज़ीर (precedent) बनेगा
  3. “मेरिट” शब्द का राजनीतिक दुरुपयोग कठिन होगा
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निष्कर्ष: सुप्रीम कोर्ट ने भ्रम नहीं, स्पष्टता दी है

यह फैसला किसी वर्ग के खिलाफ नहीं, बल्कि नियमों के पालन के पक्ष में है। यह याद दिलाता है कि:

“बराबरी का मैदान तभी संभव है, जब हर कोई एक ही नियम से खेले।”

आरक्षण सामाजिक न्याय का साधन है, लेकिन एक साथ विशेष सुविधा और सामान्य अधिकार—दोनों का दावा करना संविधान की भावना नहीं है।

Source: NBT

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