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Sambhal News: Bulldozer से पहले ग्रामीणों ने खुद गिराई अवैध मस्जिद | UP Encroachment Action

UP के संभल में प्रशासनिक बुलडोजर एक्शन से पहले ग्रामीणों ने अवैध मदीना मस्जिद को खुद ही जमींदोज कर दिया। जानिए पूरा मामला, कानून और कार्रवाई।

Sambhal News: Bulldozer से पहले ग्रामीणों ने खुद गिराई अवैध मस्जिद | UP Encroachment Action

Bulldozer से पहले ग्रामीणों ने खुद गिराई अवैध मस्जिद

उत्तर प्रदेश

12:50 PM, Jan 4, 2026

O News हिंदी Desk

संभल: बुलडोजर से पहले ही ‘मदीना मस्जिद’ जमींदोज, कानून के शिकंजे में अवैध कब्जा

उत्तर प्रदेश के संभल ज़िले से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने एक बार फिर अवैध धार्मिक अतिक्रमण, राजस्व कानून और प्रशासनिक सख़्ती पर राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है। सलेमपुर सालार उर्फ़ हाजीपुर गांव में प्रशासन की तय बुलडोज़र कार्रवाई से ठीक पहले, आधी रात में ग्रामीणों ने खुद ही दो मंज़िला ‘मदीना मस्जिद’ को गिरा दिया और पूरा मलबा साफ़ कर दिया। सुबह जब अधिकारी मौके पर पहुंचे, तो जहां कभी मस्जिद खड़ी थी वहां केवल समतल ज़मीन बची थी।

यह कोई अचानक लिया गया फ़ैसला नहीं था, बल्कि वर्षों से चल रही एक कानूनी प्रक्रिया का परिणाम था—जिसमें अवैध कब्ज़े को लेकर राजस्व संहिता, नोटिस, सुनवाई, जुर्माना और अंततः बेदख़ली का आदेश शामिल था।

किस ज़मीन पर खड़ा था विवाद?

संभल के सलेमपुर सालार उर्फ़ हाजीपुर गांव में लगभग 439 वर्ग मीटर ज़मीन चकबंदी प्रक्रिया के तहत वर्ष 2000 में गांव के गरीब परिवारों के आवास आवंटन के लिए सुरक्षित की गई थी। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक, यह ज़मीन सार्वजनिक उद्देश्य के लिए चिन्हित थी।

लेकिन 2005 के आसपास इस ज़मीन पर कब्ज़ा कर कथित तौर पर ‘मदीना मस्जिद’ का निर्माण कर दिया गया। वर्षों तक यह अवैध निर्माण बिना वैधानिक स्वीकृति के खड़ा रहा और यहां नियमित रूप से नमाज़, वुज़ू आदि की गतिविधियां होती रहीं।

लेखपाल की रिपोर्ट और धारा 67 की कार्रवाई

मामला तब निर्णायक मोड़ पर पहुंचा जब 14 जून 2025 को लेखपाल की रिपोर्ट प्रशासन के पास पहुंची। रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से ज़मीन पर अवैध कब्ज़े और बिना अनुमति निर्माण की पुष्टि की गई। इसके आधार पर उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की धारा 67 के तहत कार्रवाई शुरू की गई।

इस दौरान मुतवल्ली हाजी शमीम को सुनवाई का अवसर दिया गया। सभी दस्तावेज़ों, अभिलेखों और मौक़े की जांच के बाद प्रशासन ने निष्कर्ष निकाला कि कब्ज़ा अवैध है और सार्वजनिक हित की ज़मीन पर धार्मिक ढांचा खड़ा किया गया है, जो कानूनन अस्वीकार्य है।

बेदख़ली का आदेश और भारी जुर्माना

प्रशासन ने 2 सितंबर 2025 को बेदख़ली का आदेश पारित किया और ₹8 लाख 78 हज़ार का जुर्माना लगाया। इस बीच ऊवैस आलम की ओर से एक प्रार्थना पत्र दिया गया, जिसमें कब्ज़े को स्वीकार करते हुए अन्य भूमि से विनिमय (एक्सचेंज) की मांग की गई।

हालांकि प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया कि धार्मिक अतिक्रमण के आधार पर भूमि विनिमय विधिक नहीं है। इसी कारण 18 दिसंबर को विनिमय का प्रार्थना पत्र निरस्त कर दिया गया और संबंधित पक्षों को खुद ही अवैध ढांचे को हटाने के निर्देश दिए गए।

प्रशासन का अल्टीमेटम और तय बुलडोज़र कार्रवाई

निर्देशों के बावजूद जब मस्जिद नहीं हटाई गई, तो प्रशासन ने तय किया कि रविवार सुबह 10 बजे भारी पुलिस बल और 31 अधिकारियों की मौजूदगी में बुलडोज़र चलाकर अवैध निर्माण को जमींदोज़ किया जाएगा।

लेकिन प्रशासन के पहुंचने से पहले ही घटनाक्रम ने नया मोड़ ले लिया। शनिवार देर रात मस्जिद से जुड़े लोगों और ग्रामीणों ने खुद ही बुलडोज़र लगाकर दो मंज़िला ढांचे को गिरा दिया और रातों-रात पूरा मलबा साफ़ कर दिया।

सुबह का दृश्य: जहां मस्जिद थी, वहां खाली ज़मीन

रविवार सुबह जब प्रशासनिक टीम मौके पर पहुंची, तो किसी कार्रवाई की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। तस्वीरों और वीडियो में साफ़ दिखा कि जहां शनिवार तक मदीना मस्जिद खड़ी थी, वहां अब समतल खाली ज़मीन है।

नमाज़ अदा करने की जगह, वुज़ू का क्षेत्र—सब कुछ हटाया जा चुका था। मलबे का नामोनिशान तक नहीं बचा। यह अपने आप में प्रशासनिक कार्रवाई से पहले ‘सेल्फ-डेमोलिशन’ का दुर्लभ उदाहरण बन गया।

कैमरे से दूरी, लेकिन संदेश साफ़

हालांकि गांव में मस्जिद से जुड़े लोग कैमरे पर कुछ भी कहने को तैयार नहीं दिखे। कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया, लेकिन घटनाक्रम ने साफ़ संकेत दे दिया कि प्रशासन की सख़्ती और कानूनी दबाव के आगे अवैध निर्माण को बचा पाना संभव नहीं था।

यह भी उल्लेखनीय है कि प्रशासन की ओर से किसी तरह की बल प्रयोग की स्थिति नहीं बनी, न ही कानून-व्यवस्था बिगड़ी। पूरा प्रकरण बिना टकराव के समाप्त हो गया।

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योगी मॉडल और ‘कानून सबके लिए समान’

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सरकार लगातार यह संदेश देती रही है कि कानून सबके लिए समान है, चाहे अतिक्रमण धार्मिक हो या गैर-धार्मिक। संभल का यह मामला उसी नीति की ज़मीनी मिसाल बनकर सामने आया है।

सरकारी ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा, चाहे वह किसी भी नाम पर हो, प्रशासन की नजर में अपराध है। वर्षों से लंबित मामलों में अब कार्रवाई होती दिख रही है—और यही वजह है कि अवैध निर्माण करने वाले खुद ही ढांचा गिराने को मजबूर हो रहे हैं।

बड़ा सवाल: आगे क्या?

अब सवाल यह है कि जिस ज़मीन को गरीब परिवारों के आवास के लिए सुरक्षित किया गया था, उस पर आगे क्या होगा? प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक, ज़मीन को मूल उद्देश्य के अनुसार उपयोग में लाने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी, ताकि वास्तविक लाभार्थियों को उनका हक़ मिल सके।

संभल की यह घटना उन सभी के लिए चेतावनी है जो सरकारी या सार्वजनिक ज़मीन पर वर्षों से अवैध कब्ज़ा जमाए बैठे हैं—कि बुलडोज़र आने से पहले अगर कानून का सम्मान कर लिया जाए, तो शायद टकराव से बचा जा सकता है।

Source: TV9

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