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द ऑरेंज डिकॉय: मणिपुर की पहाड़ियों में संतरे के बाग या अफीम का काला साम्राज्य? जानें 'नकली गांवों' का पूरा सच!

"मणिपुर के कांगपोकपी में 'संतरे की खेती' के पीछे छिपे अफीम के काले साम्राज्य का खुलासा! जानें कैसे 'The Orange Decoy' के जरिए नकली गांवों का प्रोपेगेंडा फैलाया जा रहा है और कैसे सुरक्षा बलों ने नार्को-टेररिज्म के इस मास्टर प्लान को बेनकाब किया। पढ़ें पूरी इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट।"

द ऑरेंज डिकॉय: मणिपुर की पहाड़ियों में संतरे के बाग या अफीम का काला साम्राज्य? जानें 'नकली गांवों' का पूरा सच!

पहाड़ियों में संतरे के बाग या अफीम का काला साम्राज्य?

नॉर्थ ईस्ट

5:29 PM, Jan 27, 2026

O News हिंदी Desk

द ऑरेंज डिकॉय: कांगपोकपी में 'संतरे की खेती' के पीछे कैसे छिपा है अफीम का काला साम्राज्य?

मणिपुर के कांगपोकपी में 'नकली गांवों' का सच आया सामने; जानिए कैसे फलदार पेड़ों की आड़ में जंगलों को उजाड़कर फल-फूल रहा है नार्को-टेररिज्म का नया मॉडल।

नई दिल्ली/इम्फाल | 27 जनवरी 2026

मणिपुर की खूबसूरत पहाड़ियों में इन दिनों एक खतरनाक और बेहद शातिर 'गेम प्लान' चल रहा है। इसे नाम दिया गया है— 'द ऑरेंज डिकॉय' (The Orange Decoy)। ऊपरी तौर पर देखने में यह किसी शांत पहाड़ी गांव की फलदार खेती लग सकती है, लेकिन इसकी गहराई में उतरते ही अफीम की खेती और अवैध कब्जों का एक ऐसा जाल मिलता है, जो राज्य की सुरक्षा और पर्यावरण दोनों के लिए नासूर बन चुका है।

हाल ही में कांगपोकपी जिले के K. Songlung (II) नामक स्थान पर हुई एक घटना ने इस पूरे नेक्सस का भंडाफोड़ कर दिया है। आइए विस्तार से समझते हैं कि कैसे मुट्ठी भर फार्महाउसों को 'गांव' बताकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रोपेगेंडा फैलाया जा रहा है और इसकी आड़ में अफीम का काला कारोबार फल-फूल रहा है।

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1. 'K. Songlung' की आगजनी: प्रोपेगेंडा बनाम हकीकत

26 जनवरी 2026 को जब पूरा देश गणतंत्र दिवस मना रहा था, तब कांगपोकपी के तथाकथित गांव 'K. Songlung (II)' में आगजनी की खबर आई। कुकी (Kuki) नागरिक समाज संगठनों (CSOs) जैसे CoTU और SAHILCA ने तुरंत इसे सोशल मीडिया पर 'एक शांत आदिवासी गांव पर हमला' करार दिया।

सोशल मीडिया पर संतरे के लदे हुए पेड़ों की तस्वीरें साझा की गईं और दावा किया गया कि यह केवल एक फल उत्पादक गांव है। लेकिन जब सरकारी रिकॉर्ड खंगाले गए और ज़मीनी हकीकत देखी गई, तो कहानी पूरी तरह उलट निकली।

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Farm

क्या कहता है आधिकारिक डेटा?

  1. निवासी: रिकॉर्ड के अनुसार वहां केवल 4 से 5 अस्थायी फार्महाउस थे।
  2. आबादी: स्थाई निवासियों की संख्या 10 से भी कम पाई गई।
  3. वैधता: 'Manipur (Village Authorities in Hill Areas) Act, 1956' के तहत किसी भी बस्ती को 'गांव' का दर्जा तब मिलता है, जब वहां कम से कम 20 टैक्स देने वाले परिवार हों। K. Songlung इस मापदंड पर कहीं नहीं ठहरता।
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2. 'ऑरेंज डिकॉय': कैमुफ्लाज की मास्टर प्लानिंग

अफीम की खेती को छिपाने के लिए 'संतरे के पेड़ों' का इस्तेमाल करना एक सुनियोजित रणनीति है। इसे 'कैमुफ्लाज' (छलावा) तकनीक कहा जाता है।

यह कैसे काम करता है?

  1. सड़क के किनारे संतरे: मुख्य रास्तों या आसानी से दिखने वाली ढलानों पर संतरे के पेड़ लगाए जाते हैं।
  2. भीतर अफीम: इन पेड़ों की आड़ में, घने जंगलों को काटकर पहाड़ियों के बीच ऐसे हिस्सों में अफीम बोई जाती है, जो ड्रोन या सैटेलाइट की सरसरी नज़र से बच सकें।
  3. वैधता का ढोंग: अगर सुरक्षा बल या मीडिया वहां पहुंचती है, तो उन्हें संतरे के बागान दिखाकर यह साबित करने की कोशिश की जाती है कि यहां केवल बागवानी (Horticulture) हो रही है।
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3. FNCC का बड़ा खुलासा: 'कागजों पर कोई गांव नहीं'

27 जनवरी 2026 को Foothills Naga Coordination Committee (FNCC) ने एक कड़ा बयान जारी कर इस झूठ की कलई खोल दी। FNCC ने स्पष्ट किया कि जिसे 'K. Songlung' या 'K. Songlung (II)' कहा जा रहा है, उसका नाम मणिपुर गजट या आधिकारिक गांव सूची में कहीं भी दर्ज नहीं है।

FNCC की जांच के मुख्य बिंदु:

  1. ये संरचनाएं केवल अस्थायी फार्महाउस हैं, न कि पुश्तैनी गांव।
  2. 2017 के बाद इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई की गई।
  3. यह पूरी कवायद Forest (Conservation) Act, 1980 का खुला उल्लंघन है।

"यह केवल अफीम की खेती के लिए ढांचागत जगह तैयार करने की कोशिश है। संतरे के पेड़ सिर्फ एक ढाल हैं ताकि बाहरी दुनिया को गुमराह किया जा सके।"FNCC आधिकारिक बयान

Video Source:- indiatodayne Instagram

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4. ऑपरेशन 'ऑल आउट': नार्कोटिक्स हॉटस्पॉट का अंत

सुरक्षा बलों ने 2025 के अंत से ही इस क्षेत्र को अपने रडार पर ले लिया था। नवंबर 2025 में चले संयुक्त अभियानों (मणिपुर पुलिस, असम राइफल्स और CRPF) के आंकड़े चौंकाने वाले हैं:

इन आंकड़ों से साफ है कि जिसे 'संतरे का गांव' बताया जा रहा था, वह दरअसल अफीम की प्रोसेसिंग और स्टोरेज का एक बड़ा केंद्र था।

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5. 'नकली गांव' और 'विक्टिम कार्ड' की राजनीति

यह केवल ड्रग्स का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरी राजनीतिक चाल भी है। कुछ उपद्रवी तत्व 'नकली गांवों' के जरिए कई लक्ष्यों को साध रहे हैं:

  1. अवैध कब्जा: जंगलों की जमीन पर कब्जा कर उसे 'आदिवासी अधिकार' का नाम देना।
  2. सीमा विस्तार: नागा बहुल इलाकों या संरक्षित वनों में बस्तियां बसाकर क्षेत्रीय दावा (Territorial Assertion) मजबूत करना।
  3. नार्को-इकोनॉमी: अफीम से होने वाली करोड़ों की कमाई से अवैध हथियारों और उग्रवाद को बढ़ावा देना।
  4. इमोशनल ब्लैकमेल: जब सुरक्षा बल अफीम नष्ट करते हैं, तो उसे 'गरीब किसानों पर जुल्म' बताकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मणिपुर की छवि खराब करना।
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6. पर्यावरण का विनाश: नग्न होती पहाड़ियां

अफीम की खेती के लिए जंगलों को जलाना (Jhum cultivation का गलत इस्तेमाल) मणिपुर की पारिस्थितिकी के लिए घातक साबित हो रहा है।

  1. मिट्टी का क्षरण: पेड़ों के कटने से मानसून में भूस्खलन (Landslides) का खतरा बढ़ गया है।
  2. जल स्तर में गिरावट: अफीम की खेती के लिए भारी मात्रा में उर्वरकों का उपयोग होता है, जो पहाड़ी झरनों के पानी को जहरीला बना रहा है।
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7. आगे की राह: क्या होना चाहिए समाधान?

विशेषज्ञों और FNCC का मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए सरकार को 'जीरो टॉलरेंस' नीति अपनानी होगी:

  1. हाई-टेक सर्वे: केवल ज़मीनी रिपोर्ट पर भरोसा न करके ड्रोन और हाई-रिज़ॉल्यूशन सैटेलाइट इमेजिंग से 'संतरा बनाम अफीम' का अनुपात जांचा जाए।
  2. Village Act का सख्ती से पालन: बिना 20 परिवारों और आधिकारिक गजट के किसी भी बस्ती को सरकारी लाभ या मान्यता न दी जाए।
  3. वन रक्षकों को मजबूती: वन विभाग को अर्धसैनिक बलों के साथ मिलकर आरक्षित वनों (Reserved Forests) में गश्त बढ़ानी चाहिए।
  4. नार्को-टेररिज्म लिंक की जांच: यह पता लगाया जाना चाहिए कि अफीम की बिक्री से आने वाला पैसा किन उग्रवादी संगठनों तक पहुंच रहा है।

निष्कर्ष

कांगपोकपी के पहाड़ों में संतरों की खुशबू के पीछे अफीम की जो दुर्गंध छिपाई जा रही है, उसे अब देश के सामने लाना जरूरी है। मणिपुर को 'नशा मुक्त' बनाने के लिए केवल फसल काटना काफी नहीं है, बल्कि उन 'फर्जी गांवों' की जड़ पर प्रहार करना होगा जो इस अवैध कारोबार की ढाल बने हुए हैं।

जब तक ये 'ऑरेंज डिकॉय' बेनकाब नहीं होंगे, तब तक मणिपुर की शांति और सुरक्षा पर काले बादल मंडराते रहेंगे।

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क्या आपको लगता है कि पहाड़ियों में अवैध गांवों की पहचान के लिए सैटेलाइट मैपिंग अनिवार्य कर देनी चाहिए? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में बताएं।

Source: O News Hindi

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