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CM हिमंता का अनोखा सुझाव: 'मिया' समुदाय को ₹1 कम दो, तभी असम बचेगा!

असम के CM हिमंता बिस्वा सरमा ने 'मिया' मुसलमानों को लेकर दिया विवादित बयान। ₹5 की जगह ₹4 किराया देने की सलाह और मतदाता सूची से 5 लाख नाम हटाने का दावा। जानिए क्या है असम का नया 'सियासी' फॉर्मूला।

CM हिमंता का अनोखा सुझाव: 'मिया' समुदाय को ₹1 कम दो, तभी असम बचेगा!

'मिया' समुदाय को ₹1 कम दो, तभी असम बचेगा!

असम

5:41 PM, Jan 28, 2026

O News हिंदी Desk

असम में ‘अर्थशास्त्र’ का नया फॉर्मूला: ₹5 का किराया, ₹4 की राजनीति और पहचान की लंबी लड़ाई

गुवाहाटी | 28 जनवरी, 2026

भारत में चुनावी राजनीति अक्सर बड़े वादों, लोकलुभावन घोषणाओं और विकास के रोडमैप पर टिकी रहती है। लेकिन असम में पिछले कुछ दिनों से एक ऐसी बहस जन्म ले चुकी है जिसकी जड़ें न तो किसी हाईवे प्रोजेक्ट में हैं, न किसी मेगा-स्कीम में—बल्कि रोज़मर्रा के जीवन में दिए जाने वाले साधारण ₹5 के किराये में हैं। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के हालिया बयान ने इस किराये को केवल किराया नहीं, बल्कि राजनीतिक मनोविज्ञान का एक नया सूत्र बना दिया है।

एक रुपये की ‘किफायती’ राजनीति

मुख्यमंत्री ने अपने संवाद में कहा कि यदि असम में रिक्शा का किराया ₹5 हो, तो कुछ समुदायों (खासतौर पर मिया कहे जाने वाले) को ₹4 ही दिया जाए। तर्क यह कि जब जेब पर चोट लगेगी, तो असम का मोह भी कम होगा। यह विचार सुनने में जितना सरल लगता है, उसके पीछे डेमोग्राफिक चिंताओं, सांस्कृतिक सुरक्षा और राजनीतिक गणित का एक लंबा अध्याय है।

यहां राजनीति का लक्ष्य केवल विरोधी को हराना नहीं, बल्कि एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनाना बताया जा रहा है जिसमें असमिया पहचान लंबे समय तक सुरक्षित रहे। यही वह बिंदु है जहां आर्थिक व्यवहार और राजनीतिक संदेश एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं।

असम का सबसे पुराना प्रश्न: पहचान और जनसांख्यिकी

असम में नागरिकता और पहचान का विषय नया नहीं है। 1979 से 1985 तक का असम आंदोलन, NRC की प्रक्रिया, और CAA पर हुई बहस—ये सब इसी मुद्दे की शाखाएँ हैं। 2026 के इस दौर में यह बहस नए अंदाज में सामने आ रही है—इलेक्टोरल रोल के विशेष पुनरीक्षण के साथ।

सरकार का दावा है कि स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (SIR) से मतदाता सूची में पारदर्शिता आएगी, और ऐसे नाम हटेंगे जो पात्र नहीं हैं। अनुमान लगाया जा रहा है कि इससे बड़ी संख्या में नाम सूची से बाहर हो सकते हैं। इससे समर्थकों को लगता है कि असम की सांस्कृतिक सुरक्षा के लिए यह जरूरी है।

मुख्यमंत्री इसे असम की पहचान बचाने की लड़ाई बताते हैं, वहीं आलोचक इसे आर्थिक असुविधा पर आधारित राजनीति कहते हैं। लेकिन इस रिपोर्ट में हम आरोप या बचाव की भूमिका में नहीं जा रहे, बल्कि केवल विश्लेषणात्मक दृष्टि से समझने की कोशिश कर रहे हैं कि यह मॉडल वास्तव में क्या दर्शाता है।

राजनीति का अर्थशास्त्र: ‘डेली डिस्टर्बेंस’ का सिद्धांत

मुख्यमंत्री की बेबाक शैली में उन्होंने एक बात और स्पष्ट कही—“परेशान करना ही लक्ष्य है।” आम राजनीतिक भाषणों में जहां “सभी को साथ लेकर चलेंगे” जैसे वाक्य बार-बार सुनाई देते हैं, वहीं असम में यह नई भाषा सामने आई है। यह भाषा सीधे कहती है:

  1. सुरक्षा जरूरी है
  2. पहचान जरूरी है
  3. और इसके लिए कुछ असुविधा स्वीकार्य है

इसे सरकार अपने 30 साल के प्लान का हिस्सा बताती है। यानी यह चुनावी नारा नहीं, बल्कि लंबा सांस्कृतिक प्रोजेक्ट है।

सरकार की सोच:

✔ असमिया पहचान सुरक्षित रहे

✔ स्वदेशी समुदाय प्रभावित न हों

✔ नागरिकता पर स्पष्टता आए

✔ आर्थिक प्रोत्साहन या दंड व्यवहार को बदल सकता है

इस दृष्टि से देखें तो ₹1 की कटौती केवल मज़ाकिया टिप्पणी नहीं है, बल्कि व्यवहारिक अर्थशास्त्र (Behavioral Economics) का प्रयोग है, जिसमें समाज के व्यवहार को छोटे आर्थिक संकेतों से नियंत्रित करने का प्रयास किया जाता है।

असम का सामाजिक भूगोल और मिया की पहचान

असम में ‘मिया’ शब्द का इस्तेमाल उन बंगाली मूल के मुसलमान समुदायों के लिए होता है जिनकी आव्रजन यात्रा का इतिहास बीते शताब्दी से जुड़ा है। वे असम के सामाजिक ढांचे में:

  1. खेतिहर मजदूर
  2. रिक्शा चालक
  3. दिहाड़ी कामगार
  4. छोटी व्यापारिक गतिविधियों

में बड़ी संख्या में मौजूद हैं। सरकार का कहना है कि इसमें से एक हिस्सा अवैध आव्रजन से जुड़ा है, जिसे नियंत्रित करना जरूरी है। विपक्ष का कहना है कि इसमें गरीबों का अपमान छिपा है। दोनों पक्ष अपनी-अपनी दलीलें रखते हैं, लेकिन ज़मीन पर जो दिखाई देता है वह यह कि अब राजनीति जनगणना से निकलकर जेब तक पहुँच चुकी है।

इलेक्टोरल रोल की लड़ाई: किसका नाम रहेगा, किसका नहीं?

असम में NRC पहले ही एक बड़ा अध्याय रहा। उस प्रक्रिया में लाखों नाम फाइनल सूची से बाहर रहे। अब Special Revision (SIR) ने इस चर्चा को फिर तेज कर दिया है। सरकार का दावा है कि यह केवल मतदाता सूची की शुद्धि है, और यह प्रक्रिया नियमित होती रही है।

परंतु जब इसे जनसांख्यिकी की राजनीति से जोड़कर देखा जाने लगे, तब मामला केवल प्रशासनिक नहीं रहता, बल्कि सांस्कृतिक सुरक्षा और राजनीतिक गणित का विषय बन जाता है।

यहां एक दिलचस्प बात यह भी है कि सरकार बार-बार यह स्पष्ट कर रही है:

✔ असमिया मुसलमान सुरक्षित

✔ असमिया हिंदू सुरक्षित

✔ मूलनिवासी जनजातियाँ सुरक्षित

✔ केवल संदिग्ध और वेरिफिकेशन वाले मामलों पर कार्रवाई

यानी पूरे मामले में लक्षित समूह स्पष्ट रखे गए हैं।

विपक्ष और सामाजिक संगठनों की चिंताएँ

विपक्ष इसे हेट स्पीच, मानवाधिकार, और आर्थिक बहिष्कार के चश्मे से देखता है। मानवाधिकार समूह कहते हैं:

  1. इससे गरीब मजदूरों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है
  2. इससे सामाजिक दूरी बढ़ती है
  3. इससे श्रम आधारित आर्थिक तंत्र प्रभावित होता है

लेकिन दूसरी तरफ समर्थक कहते हैं:

  1. असम का सांस्कृतिक भविष्य दांव पर है
  2. पहचान की लड़ाई केवल भाषणों से नहीं जीती जा सकती
  3. आर्थिक व्यवहार समाज बदल सकता है

दोनों दृष्टिकोणों में तर्क हैं। यही लोकतंत्र का सौंदर्य भी है—जहाँ एक ही घटना पर दो नैरेटिव संभव हैं।

मानव कोण: जब राजनीति रिक्शा तक पहुँचती है

न्यूज़रूम से बाहर निकलकर अगर हम असम की सड़कों पर जाएँ तो कहानी थोड़ी और बदल जाती है। एक साधारण रिक्शा चालक, जो शायद खुद भी कागज़ों की उलझन में पड़ा हो, अब ₹1 की कटौती को केवल कटौती की तरह नहीं देखता, बल्कि असमिया समाज के संकेत की तरह देखता है।

जब राजनीति मॉल, पार्क, या टीवी डिबेट से हटकर रिक्शा के पायदान तक पहुँच जाती है तो वह केवल वोट नहीं बदलती—वह समाजिक मनोविज्ञान बदल देती है।

यह ध्यान रखने योग्य है कि असम की धरती ने:

  1. सांस्कृतिक संघर्ष
  2. भाषाई आंदोलन
  3. नागरिकता बहस

को बहुत नजदीक से देखा है। इसलिए यहाँ राजनीति कभी केवल राजनीति नहीं रहती—वह हमेशा पहचान से जुड़ती है।

क्या यह दांव सफल होगा?

यह सवाल अभी भविष्य में छिपा है। लेकिन कुछ बातें स्पष्ट हैं:

  1. ध्रुवीकरण अब स्थायी राजनीतिक उपकरण बन चुका है
  2. डेमोग्राफिक बैलेंस असम की केंद्रीय चिंता है
  3. व्यवहारिक अर्थशास्त्र राजनीति में जगह बना रहा है
  4. लंबी अवधि की रणनीति अपनाई जा रही है

यह केवल चुनावी परीक्षा नहीं बल्कि समय की परीक्षणशाला है।

निष्कर्ष: यह आग बुझाएगी या और सुलगाएगी?

इतिहास बताता है कि आर्थिक बहिष्कार और सामाजिक दबाव कई जगहों पर पलायन और तनाव को बढ़ाते हैं। लेकिन समर्थक मानते हैं कि यही सांस्कृतिक सुरक्षा की कीमत है।

इस कहानी का सबसे दिलचस्प पात्र कोई नेता, कोई पार्टी या कोई संगठन नहीं—बल्कि असम की जनता है, जिसने तय करना है कि:

  1. क्या ₹1 की यह ‘सियासी कटौती’ जनसांख्यिकी को संतुलित करेगी?
  2. या फिर यह असम की बहस को और गहरा कर देगी?

मुख्यमंत्री ने अपना फॉर्मूला पेश कर दिया है। अब गेंद चुनाव आयोग, कोर्ट, और सबसे महत्वपूर्ण—जनता के पाले में है।

Source: O News hindi

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