मणिपुर में दूसरा 'कश्मीरी पंडित' कांड? अपने ही घरों से खदेड़े गए मैतेई हिंदू, सुरक्षाबलों की चुप्पी पर उठे सवाल
"मणिपुर में जारी जातीय हिंसा के बीच मैतेई हिंदुओं के मन में कश्मीरी पंडितों जैसा हश्र झेलने का डर गहरा गया है। इंफाल वेस्ट में पुनर्वास सर्वे के दौरान विस्थापित परिवारों को हथियारबंद भीड़ ने रोका, जिसके बाद सुरक्षा बलों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। पढ़ें ग्राउंड रिपोर्ट और विस्थापन का पूरा सच।"

क्या मणिपुर के मैतेई हिंदू बनेंगे नए 'कश्मीरी पंडित'?
मणिपुर
6:49 PM, Feb 2, 2026
O News हिंदी Desk
मणिपुर हिंसा: क्या मैतेई समाज भी कश्मीरी पंडितों जैसी विभीषिका की ओर बढ़ रहा है?
नई दिल्ली/इंफाल: भारत के पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में बीते तीन वर्षों से जारी जातीय संघर्ष अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ भविष्य की धुंधली तस्वीर भयावह नजर आने लगी है। हाल ही में इंफाल वेस्ट जिले में हुई एक घटना ने न केवल सुरक्षा तंत्र पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि मैतेई हिंदू समुदाय के मन में एक गहरा डर पैदा कर दिया है—"क्या हम अपने ही देश में दूसरे 'कश्मीरी पंडित' बनने की ओर अग्रसर हैं?"
यह सवाल किसी राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि ज़मीनी हकीकत और विस्थापितों के आंखों देखे दर्द से उपजा है।
उस दिन कांतो प्रेमनगर में क्या हुआ?
इंफाल वेस्ट के लेइमाखोंग और कांतो प्रेमनगर जैसे इलाकों में जो हुआ, उसने सरकारी पुनर्वास (Rehabilitation) की दावों की पोल खोल दी है। रिपोर्टों के अनुसार, आंतरिक रूप से विस्थापित (IDP) मैतेई परिवारों का एक समूह सरकारी अधिकारियों और सुरक्षा बलों के साथ अपने घरों का आकलन करने पहुँचा था। उद्देश्य था—अपने उजड़े हुए आशियानों को दोबारा बसाने की संभावना तलाशना।
मौके पर सेकमई के सब-डिविजनल ऑफिसर (SDO), पुलिस बल और गोरखा राइफल्स के जवान मौजूद थे। लेकिन जैसे ही यह टीम कांतो प्रेमनगर और एक्स-सर्विसमेन कॉलोनी के पास पहुँची, एक छोटे लेकिन आक्रामक समूह ने उनका रास्ता रोक दिया।
कुल्हाड़ी, लाठियां और सुरक्षा बलों की चुप्पी
चश्मदीदों का दावा है कि कुकी समुदाय के करीब 10-20 लोगों ने, जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं, पारंपरिक हथियारों के साथ टीम को चुनौती दी। चौंकाने वाली बात यह रही कि आधुनिक हथियारों से लैस सुरक्षा बलों ने उन उपद्रवियों को हटाने या रास्ता साफ करने के बजाय, खुद पीड़ित IDPs को ही पीछे हटने और वापस लौटने की सलाह दी।
यह 'रणनीतिक वापसी' मैतेई समुदाय के लिए किसी सदमे से कम नहीं थी। उनका तर्क सीधा है: "अगर भारी सुरक्षा के बीच भी हम अपने मूल निवास स्थान तक नहीं जा सकते, तो हम सुरक्षित वापसी की उम्मीद कैसे करें?"
How will Meitei go back to their own land if Security forces are chased away by 10/20 Kuki women? Today at Kanto Premnagar and Ex Servicemen Colony of Leimakhong in Imphal West, Meitei IDP and SF were chased away who went to assess their own homes. pic.twitter.com/pR2pJmdoFK
— Meitei People's Perspective (@meiteiviewpoint) February 2, 2026
इंफाल वेस्ट में पुनर्वास सर्वे के दौरान कुकी समूह के हमले में एक IDP और SDC कर्मचारी घायल हो गए। मौके पर सुरक्षा बलों की मौजूदगी के बावजूद हमलावरों पर कार्रवाई न होने से मैतेई समुदाय में भारी आक्रोश है, जिससे कश्मीरी पंडितों जैसे पलायन का डर फिर गहरा गया है।
कश्मीरी पंडितों के पलायन से तुलना: डर या हकीकत?
1990 के दशक में कश्मीर घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन भारतीय इतिहास का एक काला अध्याय है। आज मणिपुर के मैतेई हिंदू उसी इतिहास को दोहराए जाने की आशंका जता रहे हैं। इसके पीछे कई ठोस कारण नजर आते हैं:
- जमीनी पकड़ का खोना: जिस तरह कश्मीर में पंडितों की संपत्तियों पर कब्जे हुए और वे अल्पसंख्यक हो गए, वैसी ही स्थिति अब मणिपुर के मिश्रित आबादी वाले इलाकों में बन रही है।
- राज्य तंत्र की लाचारी: कश्मीर में उस समय प्रशासन मूकदर्शक बना रहा था। मणिपुर की हालिया घटना में सुरक्षा बलों का पीछे हटना इसी लाचारी की याद दिलाता है।
- लंबे समय तक कैंपों में रहना: 2023 से शुरू हुई हिंसा के बाद हजारों मैतेई परिवार राहत शिविरों (Relief Camps) में रह रहे हैं। जब अस्थायी विस्थापन स्थायी होने लगता है, तो वह 'पलायन' का रूप ले लेता है।
- पक्षपात का आरोप: मैतेई प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जब वे अपनी आवाज़ उठाते हैं, तो उन पर आंसू गैस और रबर की गोलियां चलाई जाती हैं, लेकिन दूसरे पक्ष के हिंसक अवरोध के सामने प्रशासन झुक जाता है।
भौगोलिक और जनसांख्यिकीय जटिलता
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मणिपुर की समस्या को समझने के लिए इसकी भौगोलिक बनावट को समझना जरूरी है। मणिपुर एक 'तश्तरी' (Saucer) की तरह है, जिसके बीच में घाटी है (जहाँ मुख्य रूप से मैतेई रहते हैं) और चारों ओर पहाड़ हैं (जहाँ कुकी और नागा जनजातियाँ रहती हैं)।
हालिया घटना जिन इलाकों में हुई, वे घाटी क्षेत्र का हिस्सा माने जाते हैं। यदि घाटी के इन सीमावर्ती इलाकों में भी मैतेई सुरक्षित नहीं हैं, तो इसका अर्थ है कि राज्य का भूगोल अब मनोवैज्ञानिक और जातीय सीमाओं में पूरी तरह बंट चुका है। इसे 'बफर जोन' का नाम दिया गया है, लेकिन हकीकत में यह 'नो मैन्स लैंड' बनता जा रहा है।
सुरक्षा बलों की भूमिका और निष्पक्षता पर सवाल
किसी भी लोकतांत्रिक समाज में सुरक्षा बलों की पहली जिम्मेदारी नागरिक के अधिकारों की रक्षा करना है। लेकिन मणिपुर में सुरक्षा बल एक कठिन चुनौती का सामना कर रहे हैं।
- दोहरा मापदंड: मैतेई संगठनों का आरोप है कि केंद्रीय बल (Central Forces) और राज्य पुलिस के बीच तालमेल की कमी है।
- विश्वास की कमी: जब सुरक्षा बल उपद्रवियों के सामने झुकते दिखते हैं, तो आम नागरिक का मनोबल टूट जाता है। कांतो प्रेमनगर की घटना ने सरकार के "पुनर्वास के वादों" पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
क्या है समाधान? शांति की राह में बड़ी बाधाएं
मणिपुर में शांति केवल बयानों से नहीं आएगी। इसके लिए कुछ कड़े और निष्पक्ष कदम उठाने होंगे:
- कानून का समान शासन (Rule of Law): चाहे अवरोध पैदा करने वाला पक्ष कोई भी हो, कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए। अगर कोई सरकारी काम में बाधा डालता है, तो उस पर सख्त कार्रवाई अनिवार्य है।
- सुरक्षित गलियारा (Safe Passage): विस्थापितों की उनके मूल घरों में वापसी के लिए केवल सर्वे नहीं, बल्कि एक सुरक्षित और स्थायी सुरक्षा कवच की जरूरत है।
- संवाद की बहाली: मैतेई और कुकी समुदायों के बीच संवाद पूरी तरह टूट चुका है। जब तक दोनों पक्षों के नागरिक समाज (Civil Society) टेबल पर नहीं बैठेंगे, स्थायी शांति असंभव है।
- प्रशासनिक इच्छाशक्ति: राज्य और केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी समुदाय को 'दूसरे दर्जे का नागरिक' महसूस न हो।
निष्कर्ष: वक्त हाथ से निकलता जा रहा है
मणिपुर आज एक दोराहे पर खड़ा है। कांतो प्रेमनगर की घटना एक अलार्म है। यदि आज विस्थापित मैतेई हिंदुओं को अपने घर लौटने का भरोसा नहीं दिलाया गया, तो इतिहास उन्हें '21वीं सदी के कश्मीरी पंडित' के रूप में दर्ज करेगा।
यह केवल एक समुदाय के घर लौटने का सवाल नहीं है, बल्कि भारत की अखंडता और न्याय व्यवस्था की साख का सवाल है। सरकार को अब 'वेट एंड वॉच' की नीति छोड़कर 'एक्शन और रिहैबिलिटेशन' पर ध्यान देना होगा। वरना, विस्थापन का यह घाव इतना गहरा हो जाएगा कि इसे भरना आने वाली पीढ़ियों के लिए भी मुमकिन नहीं होगा।
अस्वीकरण: यह लेख हालिया मीडिया रिपोर्ट्स और स्थानीय घटनाक्रमों के विश्लेषण पर आधारित है। प्रशासन की ओर से आधिकारिक पुष्टि की प्रतीक्षा है।
Source: O News Hindi


