"हिमंता बिस्वा सरमा के 'एक्शन' से क्यों फड़फड़ा रहे हैं कट्टरपंथी संगठन? दिल्ली से गुवाहाटी तक छिड़ा महायुद्ध!"
"असम में अवैध घुसपैठ और जनसांख्यिकीय बदलाव के बीच मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का सख्त रुख। जानिए क्यों AIMPLB जैसे संगठन 'मिया' मुसलमानों के समर्थन में खड़े हैं और क्या यह राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता है? असमिया अस्मिता और घुसपैठ की राजनीति पर एक विस्तृत विश्लेषण।"

"हिमंता बिस्वा सरमा के 'एक्शन' से क्यों फड़फड़ा रहे हैं कट्टरपंथी संगठन?
असम
5:01 PM, Jan 31, 2026
O News हिंदी Desk
असम का अस्तित्व और 'मिया' राजनीति: क्यों हिमंता बिस्वा सरमा का स्टैंड राज्य की अस्मिता के लिए अनिवार्य है?
प्रस्तावना: असम की बदलती तस्वीर और एक कठिन सत्य
ब्रह्मपुत्र की लहरों और चाय के बागानों की हरीतिमा के बीच बसा असम आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहाँ उसकी सांस्कृतिक पहचान और जनसांख्यिकीय संरचना (Demographics) दांव पर लगी है। पिछले कुछ दशकों में असम ने जो झेला है, वह केवल 'घुसपैठ' का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह संसाधनों पर कब्जे और मूल निवासियों के अस्तित्व को मिटाने की एक धीमी प्रक्रिया रही है।
हाल के दिनों में, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) जैसे संगठनों ने मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति का दरवाजा खटखटाया है। वे सरमा के बयानों को 'नफरत भरा' करार दे रहे हैं। लेकिन क्या यह वास्तव में नफरत है, या फिर अपने घर को बचाने की एक बेबाक कोशिश? जब हम तथ्यों की गहराई में उतरते हैं, तो समझ आता है कि हिमंता बिस्वा सरमा के सख्त कदम किसी समुदाय विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि असम की संप्रभुता और कानून के शासन को बनाए रखने के लिए हैं।
1. 'साइलेंट इनवेजन': सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी और जमीनी हकीकत
असम में अवैध घुसपैठ कोई काल्पनिक हौआ नहीं है। भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने सालों पहले इसे 'साइलेंट इनवेजन' (मौन आक्रमण) की संज्ञा दी थी। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा जब "अवैध बांग्लादेशी मियों" के खिलाफ कार्रवाई की बात करते हैं, तो वे उसी संवैधानिक चिंता को स्वर दे रहे होते हैं।
जनसांख्यिकीय आंकड़े गवाह हैं कि असम के कई जिले, जो कभी स्वदेशी समुदायों के गढ़ थे, आज वहां की आबादी का संतुलन पूरी तरह बदल चुका है। जब मुस्लिम संगठन इन अवैध प्रवासियों के पक्ष में खड़े होते हैं, तो वे अनजाने में उस प्रक्रिया को खाद-पानी देते हैं जिसने असमिया भाषा, संस्कृति और भूमि अधिकारों को खतरे में डाल दिया है।
2. AIMPLB की भूमिका: अधिकारों की रक्षा या अवैधता को संरक्षण?
प्रश्न यह उठता है कि AIMPLB जैसे संगठन, जो खुद को अल्पसंख्यक अधिकारों का अलंबरदार कहते हैं, नागरिक और घुसपैठिये के बीच फर्क करने में क्यों हिचकिचाते हैं?
- सामुदायिक निष्ठा बनाम राष्ट्रीय हित: अक्सर देखा गया है कि जब भी सरकार संदिग्ध नागरिकों के सत्यापन या अतिक्रमण हटाने की बात करती है, ये संगठन इसे 'इस्लाम पर हमला' बता देते हैं। यह नैरेटिव न केवल भ्रामक है बल्कि खतरनाक भी है।
- कानूनी बाधाएं: नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) हो या NRC की प्रक्रिया, इन संगठनों ने हर उस कदम का विरोध किया है जो घुसपैठ की समस्या का स्थायी समाधान निकाल सकता था। उनकी यह जिद असमिया समाज और अन्य समुदायों के बीच अविश्वास की खाई को और गहरा करती है।
3. अतिक्रमण और संसाधनों की जंग: क्यों जरूरी है बेदखली?
असम के 'चार-चापोरी' (नदी तटीय क्षेत्र) इलाकों में बड़े पैमाने पर सरकारी जमीनों, वन क्षेत्रों और सतरों (वैष्णव मठों) की भूमि पर अवैध कब्जा हुआ है। मुख्यमंत्री सरमा ने इन क्षेत्रों से अतिक्रमण हटाने का जो बीड़ा उठाया है, वह कानून सम्मत है।
अतिक्रमणकारी अक्सर 'मिया' पहचान का उपयोग एक ढाल के रूप में करते हैं। जब प्रशासन इन अवैध ढांचों को गिराता है, तो इसे 'मानवाधिकारों का हनन' कहना उन मूल निवासियों के साथ अन्याय है जिनकी जमीनें छीन ली गईं। हिमंता बिस्वा सरमा का पक्ष स्पष्ट है: "संसाधन सीमित हैं और उन पर पहला हक असम के वैध नागरिकों का है।"
4. हिमंता बिस्वा सरमा के खिलाफ शिकायतों की राजनीति
सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति से मुख्यमंत्री के खिलाफ कार्रवाई की मांग करना एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब करना और स्थानीय स्तर पर मुस्लिम वोट बैंक को एकजुट करना है।
लेकिन क्या मुख्यमंत्री का अपराधीकरण करने से घुसपैठ की समस्या खत्म हो जाएगी? बिल्कुल नहीं। सरमा की भाषा 'कठोर' हो सकती है, लेकिन उनकी प्राथमिकताएं 'स्पष्ट' हैं। वे असम को दूसरा 'त्रिपुरा' बनने से रोकना चाहते हैं, जहाँ मूल निवासी अपनी ही जमीन पर अल्पसंख्यक हो गए।
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5. 1985 का असम समझौता और अधूरी उम्मीदें
असम समझौता स्पष्ट रूप से कहता है कि 25 मार्च 1971 के बाद आए अवैध प्रवासियों की पहचान कर उन्हें बाहर निकाला जाना चाहिए। पिछले 40 वर्षों में किसी भी सरकार ने इस दिशा में उतनी राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाई, जितनी वर्तमान सरकार दिखा रही है।
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मुस्लिम संगठनों की चुप्पी इस बात पर क्यों है कि बांग्लादेश से अवैध प्रवास को कैसे रोका जाए? उनकी चुप्पी यह संकेत देती है कि उन्हें असम के सांस्कृतिक क्षरण से अधिक चिंता अपनी राजनीतिक और धार्मिक गोलबंदी की है।
6. स्वदेशी मुसलमानों और 'मियों' के बीच का अंतर
यह समझना बेहद जरूरी है कि असम का मूल निवासी मुसलमान (जैसे गोरिया, मोरिया, देशी) खुद को इन 'मिया' प्रवासियों से अलग देखता है। वे अपनी संस्कृति और असमिया विरासत पर गर्व करते हैं। हिमंता सरकार ने इन स्वदेशी मुस्लिम समुदायों की विशिष्ट पहचान को मान्यता देकर यह साबित किया है कि उनकी लड़ाई मजहब से नहीं, बल्कि 'अवैधता' से है।
मुस्लिम संगठनों का 'मिया' समुदाय के साथ बिना शर्त खड़ा होना, इन स्वदेशी मुसलमानों के हितों को भी चोट पहुँचाता है।
7. निष्कर्ष: निष्ठा या समाधान?
असम को आज विभाजक राजनीति की नहीं, बल्कि ठोस समाधान की जरूरत है। AIMPLB जैसे संगठनों को समझना होगा कि भारत की संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ समझौता करके किसी भी प्रकार की सामुदायिक एकजुटता लंबे समय तक सफल नहीं हो सकती।
मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का रुख उन लाखों असमिया लोगों की आवाज है जो दशकों से अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यदि आज सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां अपनी विरासत को केवल किताबों में ही पढ़ पाएंगी।
समय की मांग है कि:
- नागरिकता सत्यापन की प्रक्रिया को बिना किसी धार्मिक चश्मे के देखा जाए।
- सरकारी जमीनों से अतिक्रमण को पूरी तरह साफ किया जाए।
- मुस्लिम नेतृत्व 'अवैध घुसपैठ' की खुलकर निंदा करे और कानून का साथ दे।
असम के लोगों को जवाबदेही चाहिए, और हिमंता बिस्वा सरमा वही जवाबदेही सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहे हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: हिमंता बिस्वा सरमा 'मिया' समुदाय के खिलाफ क्यों हैं?
उत्तर: मुख्यमंत्री किसी समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि 'अवैध घुसपैठ' और संसाधनों पर 'अवैध कब्जे' के खिलाफ हैं। वे असम के मूल निवासियों के अधिकारों की सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहे हैं।
प्रश्न 2: क्या मुस्लिम संगठनों की मांग जायज है?
उत्तर: संवैधानिक तौर पर किसी को भी शिकायत करने का अधिकार है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और अवैध घुसपैठ जैसे गंभीर मुद्दों पर सामुदायिक एकजुटता दिखाना असमिया समाज के व्यापक हितों के खिलाफ हो सकता है।
प्रश्न 3: असम समझौता क्या है?
उत्तर: 1985 में हुआ यह समझौता 1971 के बाद आए अवैध विदेशी नागरिकों की पहचान और निर्वासन का वैधानिक आधार प्रदान करता है।
Source: O News Hindi


