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देवरिया: बिना कागज़ वाली मजार पर योगी प्रशासन की बड़ी कार्रवाई, भारी पुलिस बल तैनात

देवरिया में 50 साल पुरानी अवैध मजार को योगी प्रशासन ने दस्तावेज़ न होने पर ध्वस्त किया। भारी पुलिस बल के बीच 6 घंटे तक चला बुलडोजर एक्शन।

देवरिया: बिना कागज़ वाली मजार पर योगी प्रशासन की बड़ी कार्रवाई, भारी पुलिस बल तैनात

बिना कागज़ वाली मजार पर योगी प्रशासन की बड़ी कार्रवाई

उत्तर प्रदेश

8:57 PM, Jan 11, 2026

O News हिंदी Desk

देवरिया में 50 साल पुरानी मजार पर योगी प्रशासन की बड़ी कार्रवाई — कागज़ात न मिलने पर चला बुलडोजर, 6 घंटे तक चला ध्वस्तीकरण

उत्तर प्रदेश के देवरिया में रविवार (11 जनवरी 2026) को प्रशासन ने अवैध कब्जों पर अब तक की सबसे कड़ी कार्रवाई करते हुए गोरखपुर रोड स्थित ओवरब्रिज के पास बनी 50 साल पुरानी मजार को ध्वस्त कर दिया। बताया जा रहा है कि यह मजार बिना किसी विधिक अनुमति और भूमि संबंधी दस्तावेज़ों के बनी हुई थी। प्रशासन ने मजार संचालकों को पहले नोटिस देकर मौके पर कागज़ प्रस्तुत करने को कहा था, लेकिन दस्तावेज़ उपलब्ध न होने के बाद ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई।

रविवार दोपहर करीब 12 बजे भारी पुलिस बल की मौजूदगी में मजार परिसर को खाली कराया गया। इसके बाद नगर पालिका और जिला प्रशासन की टीम ने 3 बुलडोजरों की सहायता से कार्रवाई शुरू की, जो लगभग 6 घंटे तक चली। इस दौरान मजार का मुख्य द्वार, बाउंड्री वॉल, गुंबद, तीन दुकानें और बाहरी ढांचा ध्वस्त कर दिया गया। अंधेरा होने एवं सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनज़र रात में कार्रवाई रोक दी गई और शेष हिस्सों को सोमवार को तोड़ने का निर्णय लिया गया।

6 थानों की पुलिस तैनात, SDM मौके पर मौजूद

ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया कानून-व्यवस्था की दृष्टि से संवेदनशील मानी जा रही थी, इसलिए मौके पर 6 थानों से करीब 300 से अधिक पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई। आसपास के क्षेत्रों में पैदल गश्त, बैरिकेडिंग और मोबाइल वैन की गश्त के इंतज़ाम किए गए थे। SDM श्रुति शर्मा स्वयं मौके पर मौजूद रहीं और पूरे अभियान की निगरानी करती रहीं। इसके अलावा ADM, CO, तहसीलदार और नगर पालिका के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे।

प्रशासनिक सूत्र बताते हैं कि नगर पालिका ने पूर्व में अवैध निर्माण हटाने का नोटिस जारी किया था, जिसे मजार प्रबंधन की ओर से गंभीरता से नहीं लिया गया। इस वजह से यह मामला कोर्ट तक पहुँच गया और आखिरकार कार्रवाई का आदेश पारित हुआ।

विवाद की शुरुआत कहाँ से हुई?

इस मजार को लेकर विवाद कोई अचानक पैदा हुई स्थिति नहीं है। इसकी शुरुआत वर्ष 2019 में हुई, जब कुछ स्थानीय नागरिकों ने पूर्व जिलाधिकारी के पास लिखित शिकायत की कि ओवरब्रिज के पास बनी यह संरचना अवैध कब्जे पर खड़ी है और यातायात व नगर विकास को बाधित कर रही है। शिकायत मिलते ही डीएम ने RBO के जूनियर इंजीनियर, तहसीलदार और लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों को जाँच के आदेश दिए थे।

14 दिसंबर 2019 को मजार संचालन समिति को नोटिस जारी कर भूमि एवं निर्माण से जुड़े कागज़ माँगे गए। इसके बाद कई तारीखें लगीं, जवाब दाखिल करने की समय सीमा बढ़ती रही, लेकिन विवाद का समाधान नहीं निकला। प्रशासन ने बार-बार भूमि के स्वामित्व से जुड़े दस्तावेज़ एवं नक्शे प्रस्तुत करने को कहा, लेकिन मजार प्रबंधन दस्तावेज़ प्रस्तुत करने में असफल रहा।

कानूनी प्रक्रिया: जमीन को ‘बंजर’ घोषित कर चुका था कोर्ट

सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब बीते शुक्रवार को इस मामले की सुनवाई SDM कोर्ट में हुई। अपर जिला शासकीय अधिवक्ता जयदीप गुप्ता ने अदालत को बताया कि संबंधित भूमि को राजस्व अभिलेख में ‘बंजर भूमि’ यानी बिना किसी निजी स्वामित्व वाली सरकारी भूमि घोषित किया जा चुका है।

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष से पूछा गया कि क्या उनके पास जमीन का खाता-खतौनी, रिकॉर्ड, नक्शा या निर्माण की वैध अनुमति है? जवाब में बचाव पक्ष कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका। इसके बाद कोर्ट ने नोटिस जारी कर प्रशासन को ध्वस्तीकरण की अनुमति दे दी, जिसके तुरंत बाद रविवार को बुलडोजर की कार्रवाई शुरू हो गई।

स्थानीय स्तर पर माहौल, प्रतिक्रिया और सुरक्षा

यद्यपि कार्रवाई की सूचना मिलते ही क्षेत्र में चर्चा तेज हो गई, लेकिन भारी सुरक्षा के कारण किसी प्रकार की अवांछित घटना सामने नहीं आई। पुलिस ने समय रहते भीड़ को नियंत्रित किया और स्थानीय लोगों से संयम बरतने की अपील की। कुछ लोग मजार से धार्मिक भावनाओं के जुड़ाव का हवाला देते दिखे, जबकि अन्य लोगों ने कहा कि यदि कोई ढांचा सरकारी ज़मीन पर अवैध है तो उसे हटना ही चाहिए।

एक स्थानीय व्यापारी ने कहा — "यह सड़क और ओवरब्रिज शहर की लाइफ़लाइन है। वर्षों से मजार के कारण यहाँ ट्रैफिक जाम की समस्या रहती थी। प्रशासन ने जो किया वह नियमों के अनुसार किया।"

जबकि मजार के समर्थकों की ओर से कहा गया कि मजार 50 वर्षों से मौजूद है और धार्मिक स्थल को तुरंत तोड़ना लोगों के भावनात्मक जुड़ाव को चोट पहुँचाता है। हालाँकि, प्रशासनिक पक्ष यह स्पष्ट कर चुका है कि धार्मिक संरचना पुरानी होने भर से वैध नहीं हो जाती। इसके लिए भूमि और कानूनी कागज़ आवश्यक होते हैं।

योगी मॉडल और ‘अवैध कब्जों’ पर कार्रवाई

यूपी में पिछले कुछ वर्षों से अवैध कब्जों, अतिक्रमण और बिना अनुमति बने ढाँचों पर कार्रवाई एक ‘नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया’ बन चुकी है। इस मॉडल को विपक्ष ‘बुलडोजर राजनीति’ कहता है, जबकि समर्थक इसे ‘कानून का राज’ और ‘साफ प्रशासन’ बताते हैं।

देवरिया की यह कार्रवाई भी उसी अभियान का हिस्सा मानी जा रही है जिसमें नगर विकास, सड़क चौड़ीकरण और सरकारी भूमि मुक्त कराने को प्राथमिकता दी जा रही है।

घटना का महत्व और व्यापक प्रभाव

देवरिया की इस कार्रवाई के बाद कई राजनीतिक और सामाजिक चर्चाएँ तेज हो सकती हैं। धार्मिक संरचनाओं, सार्वजनिक भूमि और प्रशासनिक अधिकारों को लेकर भारत में वर्षों से विवाद चलता आया है। यह मामला यह भी बताता है कि—

✓ भूमि अभिलेख और राजस्व दस्तावेज़ कितने महत्वपूर्ण होते हैं,

✓ शिकायत दर्ज होने पर प्रक्रियागत कार्रवाई में वर्षों का समय भी लग सकता है,

✓ और प्रशासनिक निर्णय अंततः कानून व दस्तावेज़ों के आधार पर ही होते हैं।

अंत में

50 वर्ष पुरानी मजार पर बुलडोजर चलना केवल एक ढाँचे का गिरना नहीं, बल्कि प्रशासनिक प्रक्रिया और विधिक नियमों का सख्त पालन है। कोर्ट के फैसले, दस्तावेज़ों की अनुपस्थिति और संवैधानिक नियमों के आधार पर की गई यह कार्रवाई आने वाले समय में इसी तरह के मामलों के लिए मिसाल बन सकती है।

Source: ऑपइंडिया

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