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लंदन दूतावास पर बदला ईरान का झंडा: पुराने शेर-सूरज प्रतीक की वापसी का क्या मतलब?

लंदन में ईरान का इस्लामिक झंडा हटाया गया और शेर-सूरज वाला झंडा लहराया गया। जानें इस ऐतिहासिक प्रतीक का अर्थ, इतिहास और दोनों झंडों में अंतर।

लंदन दूतावास पर बदला ईरान का झंडा: पुराने शेर-सूरज प्रतीक की वापसी का क्या मतलब?

लंदन दूतावास पर बदला ईरान का इस्लामिक झंडा

लंदन

12:44 PM, Jan 11, 2026

O News हिंदी Desk

लंदन में हटाया गया ईरान का इस्लामिक झंडा, शेर-सूरज वाला लहराया — आखिर दोनों में अंतर क्या?

लंदन की एक ठंडी रात, केंसिंग्टन इलाके में स्थित ईरान के दूतावास की ऊंची इमारत के सामने अचानक हलचल बढ़ती है। विरोध का एक समूह ऊपर चढ़ता है, और पलक झपकते ही ईरान के दूतावास पर लहरा रहा मौजूदा इस्लामिक झंडा नीचे गिरा दिया जाता है। उसकी जगह एक ऐसा झंडा ऊपर जाता है—जिसे देखने पर समझ आता है कि ईरान के विरोध का स्वर अब सिर्फ सड़कों पर नहीं, बल्कि दुनिया के राजनयिक गलियारों तक पहुंच चुका है। यह झंडा था, ‘शेर और सूरज’ वाला ऐतिहासिक ध्वज—जो 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले ईरान की राजशाही का प्रतीक हुआ करता था।

सोशल मीडिया पर इससे मिलती-जुलती तस्वीर तब देखने को मिली जब प्लेटफ़ॉर्म X (पहले ट्विटर) ने ईरान के आधिकारिक झंडे के इमोजी को बदलकर शेर और सूरज वाला प्रतीक लगा दिया। यह महज एक छोटा सा डिज़िटल बदलाव लगता है, लेकिन हिस्से में यह संकेत देता है कि विश्व समुदाय ईरान के भीतर उभर रहे नए स्वर, राजशाही की चर्चाओं और क्रांति विरोधी भावनाओं को नोटिस कर रहा है।

ईरान में पिछले कुछ महीनों से हालात लगातार बिगड़ रहे हैं। हजारों-लाखों लोग सड़कों पर हैं, नारे गूंज रहे हैं, आगजनी हो रही है, और शासन के खिलाफ माहौल तेज है। इंटरनेट बंद होने की वजह से आम लोग दुनिया से कटे हैं, लेकिन जो जानकारी बाहर आ रही है वो चिंता बढ़ाने वाली है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के मुताबिक विरोध प्रदर्शनों में अब तक 116 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और 2600 से ज्यादा गिरफ्तारियां हो चुकी हैं।

लेकिन इस उथल-पुथल की सबसे बड़ी चर्चा का विषय बना है — ईरान का झंडा।

अब सवाल उठता है: आखिर इस शेर-सूरज वाले झंडे की ऐतिहासिक सच्चाई क्या है? मौजूदा इस्लामिक ध्वज से इसका अंतर क्या है? और सबसे अहम—आज इसे लहराना क्या संदेश देता है?

आइए पूरी कहानी समझते हैं।

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शेर-सूरज वाला झंडा—ईरान की प्राचीन पहचान का प्रतीक

जिस झंडे को आज विरोध में लहराया जा रहा है, उसका इतिहास आज का नहीं, बल्कि हजारों साल पुराना माना जाता है। प्राचीन पर्शिया (ईरान) की संस्कृति में शेर शक्ति, सामर्थ्य, साहस और राजसी गरिमा का प्रतीक था। वहीं सूरज ईरानी सभ्यता में ज्ञान, उदय, जीवन और आध्यात्मिकता से जुड़ा माना जाता रहा है।

इतिहासकार बताते हैं कि यह प्रतीक अश्कानियन और सासानी वंश के दौर से उपयोग में आ रहा था। बाद में सफवी, अफ्शारी और काजार काल तक यह झंडा ईरानी सत्ता और पहचान का चेहरे बनकर लहराता रहा। समय के साथ इसमें कुछ बदलाव भी हुए—जंग और सत्ता संघर्षों के दौर में शेर के हाथ में तलवार जोड़ दी गई, जो सैन्य शक्ति व वीरता का संकेत बन गया।

ईरान की आधुनिक राजनीति में यह प्रतीक पहली बार 1906 की संवैधानिक क्रांति के दौरान आधिकारिक बनाया गया। उसके बाद यह लगभग सात दशक तक ईरान का राष्ट्रीय ध्वज बना रहा। यह वही दौर है जिसे आज कई लोग आधुनिक ईरानी राष्ट्रवाद का स्वर्ण काल मानते हैं।

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1979 की क्रांति—और झंडे का बदलता अर्थ

फिर आया वर्ष 1979—जब शाह मोहम्मद रजा पहलवी की राजशाही का अंत हुआ, और इस्लामी नेतृत्व के तहत ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान’ अस्तित्व में आई। इसी के साथ पुराने झंडे को हटाकर नए इस्लामिक झंडे को आधिकारिक रूप से अपनाया गया।

1980 में मौजूदा झंडे को आधिकारिक रूप से लागू किया गया। इस झंडे के तीन रंग पहले से मौजूद थे — हरा, सफेद और लाल लेकिन इनके अर्थ पूरी तरह बदल दिए गए।

अब उनका अर्थ यह माना जाता है:

  1. हरा → इस्लाम और शहादत
  2. सफेद → शांति और ईमानदारी
  3. लाल → क्रांति और खून में दी गई कुरबानी

झंडे के बीच में एक इस्लामी प्रतीक जोड़ा गया और सबसे खास— हरे और लाल पट्टियों की सीमा पर कूफ़ी लिपि में “अल्लाहु अकबर” 22 बार लिखा गया। ये 22 बार इसलिए क्योंकि इस्लामी क्रांति फरवरी 1979 (22 बहमन) को सफल हुई थी।

यानी यह झंडा अब केवल ईरान राष्ट्र का नहीं, बल्कि ईरान की इस्लामी क्रांति और वैचारिक इस्लामिक शासन का प्रतीक बना दिया गया।

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दोनों झंडों में मूल अंतर क्या? — एक नजर में

अगर सरल भाषा में समझें तो:

1️⃣ शेर-सूरज वाला झंडा

✔ प्राचीन ईरानी पहचान

✔ राजशाही और राष्ट्रवाद से जुड़ा

✔ 3000 साल पुरानी सांस्कृतिक विरासत

✔ क्रांति से पहले आधिकारिक राष्ट्रीय झंडा

✔ तलवार वाला शेर → सत्ता, शक्ति, शौर्य

✔ सूरज → प्रकाश, ज्ञान और प्राचीन सभ्यता

2️⃣ मौजूदा इस्लामिक झंडा

✔ 1979 के बाद अपनाया गया

✔ “अल्लाहु अकबर” की 22 बार लिखावट

✔ वैचारिक इस्लामी पहचान और क्रांति का संदेश

✔ रंगों का अर्थ धार्मिक-सियासी परिभाषा से जुड़ा

यानी अंतर सिर्फ डिज़ाइन का नहीं, बल्कि एक पूरी विचारधारा का है।

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आज शेर-सूरज वाले झंडे को लहराने का मतलब क्या है?

अब सबसे अहम सवाल— लोग आज इसे फिर क्यों लहरा रहे हैं?

कारण स्पष्ट हैं:

✔ पहला — इस्लामी शासन के खिलाफ विरोध

इस झंडे को लहराना शासन के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक बन गया है। लंदन, बर्लिन, पेरिस, यूरोप-अमेरिका में रहने वाले ईरानी मूल के लोग इसे खास तौर पर विरोध में लहराते हैं।

✔ दूसरा — राजशाही की चर्चा

दिलचस्प बात यह है कि इस प्रतीक का उपयोग राजशाही समर्थक भी कर रहे हैं, जो शाहकाल की वापसी की बात करते हैं। हालांकि सभी प्रदर्शनकारी राजशाही नहीं चाहते, लेकिन यह झंडा “इस्लामिक शासन के विकल्प” के तौर पर देखा जा रहा है।

✔ तीसरा — सांस्कृतिक पहचान की खोज

ईरान के युवा वर्ग में अब यह भावना बढ़ रही है कि उनकी वास्तविक पहचान राजशाही या प्राचीन संस्कृति से जुड़ी थी, न कि इस्लामी गणतंत्र से।

✔ चौथा — अंतरराष्ट्रीय प्रभाव

जब X जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म झंडे का इमोजी बदलते हैं, तो यह संकेत होता है कि यह आंदोलन डिजिटल और वैश्विक स्तर पर प्रभाव डाल रहा है।

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वर्तमान विरोध और दमन—स्थिति कितनी गंभीर?

ईरान में विरोध की जड़ें गहरी हैं— महिलाओं की स्वतंत्रता, इंटरनेट बैन, धार्मिक नियंत्रण, आर्थिक संकट, बेरोजगारी और दमनकारी कानून।

इसके चलते:

  1. देश के कई शहरों में आगजनी
  2. सरकारी कार्यालयों पर हमले
  3. सुरक्षा बलों के साथ टकराव
  4. व्यापक गिरफ्तारियां

अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुसार अब तक:

➡ 116+ मौतें ➡ 2600+ गिरफ्तारियां

सरकार ने कई क्षेत्रों में इंटरनेट बंद कर दिया है ताकि जानकारी बाहर न जा सके।

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निष्कर्ष — झंडा अब सिर्फ झंडा नहीं, एक वैचारिक युद्ध का प्रतीक

ईरान के आसमान में अभी दो झंडे लड़ रहे हैं — एक राजशाही और पर्शियन सभ्यता का, दूसरा इस्लामी क्रांति और धार्मिक शासन का।

मुद्दा सिर्फ शासन परिवर्तन का नहीं, बल्कि सवाल यह भी है कि ईरानी पहचान क्या है? — क्या वो 3000 साल पुरानी संस्कृति में है? — या 45 साल पुराने धार्मिक गणराज्य में?

लंदन के दूतावास की दीवारों से लेकर इंटरनेट के इमोजी तक— इसी सवाल का जवाब तलाशा जा रहा है।

इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि ईरान का झंडा अब भूगोल का नहीं, बल्कि विचारों की लड़ाई और भविष्य की दिशा का विषय बन चुका है।

और इसी वजह से दुनिया इसे गंभीरता से देख रही है।

Source: tv9

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