1962 में 600 किलो सोना दान करने वाली दरभंगा राज की महारानी का निधन, देशभक्ति और त्याग का एक युग समाप्त
1962 भारत-चीन युद्ध में 600 किलो सोना दान करने वाली दरभंगा राज की महारानी कामसुंदरी देवी का निधन। देशभक्ति, त्याग और रियासत की परंपरा का अंत।

देशभक्ति और त्याग का एक युग समाप्त (PICS-AI)
मिथिला
12:17 PM, Jan 13, 2026
O News हिंदी Desk
दरभंगा राज की महारानी: 600 किलो सोने वाले ऐतिहासिक दान का अध्याय और एक युग का अवसान
आज का भारत जब युद्ध, अर्थव्यवस्था, सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक पहचान और इतिहास पर बहस करता है, तब बहुत कम लोग उन रियासतों को याद करते हैं जिन्होंने संकट के समय शब्दों से नहीं, खजानों से राष्ट्र की सेवा की थी। बिहार के मिथिलांचल स्थित दरभंगा राज उन्हीं विरासतों में से एक था। इस राजघराने का नाम इतिहास की वह धारा है जो संघर्ष के दौर में राजनीति नहीं, राष्ट्र-निर्माण की गंभीरता को समझती थी।
कुछ ही दिनों पहले इसी राजघराने की महारानी कामसुंदरी देवी ने 94 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ सिर्फ एक परिवार की बुजुर्ग सदस्य नहीं गईं, बल्कि स्वदेश, सेवा, त्याग और परंपरा का एक पूरा अध्याय इतिहास में समा गया। जिस भारत को आज हम शक्ति के प्रतीक के रूप में देखते हैं, उसने 1962 में ऐसा दौर भी देखा था जब युद्ध सिर्फ सीमाओं पर नहीं, संसाधनों पर भी लड़ा जा रहा था।
और उसी समय—बिना भाषण, बिना पोस्टर, बिना कैमरे और बिना घोषणा—दरभंगा राज ने राष्ट्र के सामने अपना खजाना खोल दिया। 600 किलो सोना! जी हाँ, करीब 15 मन सोना, और साथ में तीन निजी विमान व विशाल निजी हवाई अड्डा—सब राष्ट्र रक्षा के लिए समर्पित।
ये कहानी किसी कल्पना या लोककथा की नहीं बल्कि आधुनिक भारतीय इतिहास के उन पन्नों की है जिन्हें आज जानबूझकर या अनजाने में भुला दिया गया है।
जब युध्द का समय था, तब देश को दान चाहिए था—न कि भाषण
1962। भारत-चीन युद्ध। एक ऐसा दौर जब भारतीय सेना के पास हथियारों से अधिक साहस था, पर साहस से युद्ध नहीं जीते जाते। सरकार ने संसाधनों के लिए देशवासियों से अपील की। जनता ने भी दिया—कपड़े, आभूषण, गहने, रुपए-पैसे… पर शाही रियासतों में से बहुत कम लोग ऐसे थे जिन्होंने खामोशी में दान को अपना धर्म समझा।
दरभंगा राज ने वो किया जो आज भी सुनकर आश्चर्य होता है— इंद्रभवन मैदान में 15 मन यानी लगभग 600 किलो सोना तोलकर भारत के नाम कर दिया।
ऐसी कहानियाँ किसी इतिहास की पुस्तक के अध्याय की तरह नहीं, बल्कि आत्मसम्मान के दस्तावेज की तरह पढ़ी जानी चाहिए।
यही नहीं— जिस जमीन पर आज दरभंगा एयरपोर्ट है, वह कभी दरभंगा राज का निजी हवाई अड्डा था। युद्ध के समय तीनों निजी विमान और 90 एकड़ जमीन केंद्र सरकार को सौंप दी गई।
युद्ध खत्म हुआ, यादें रह गईं और सोना राष्ट्र की भट्टी में पिघलकर रक्षा क्षमता का हिस्सा बन गया।
पर क्या इस योगदान का जिक्र कभी राष्ट्रीय मंचों पर हुआ? क्या स्कूलों में पढ़ाया जाता है? क्या युवा पीढ़ी जानती है कि आज का दरभंगा एयरपोर्ट युद्धकालीन दान का प्रतीक है?
इन सवालों के जवाब में मौन है। और यही मौन इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना है।
महारानी कामसुंदरी देवी—वैभव से अधिक सेवा की विरासत
महारानी कामसुंदरी देवी उसी परंपरा की प्रतिनिधि थीं जहाँ सत्ता का उद्देश्य दिखावा नहीं, सेवा होता था। 1940 के दशक में उनका विवाह रियासत के अंतिम शासक महाराजा कामेश्वर सिंह से हुआ। वे महाराजा की तीसरी पत्नी थीं।
महाराजा कोई सामान्य नाम नहीं थे—वे स्वतंत्रता पूर्व और पश्चात भारत की राजनीति, आर्थिक संरचना और सांस्कृतिक धरोहर में गहरी छाप छोड़ने वाली शख्सियत थे। 1962 में महाराजा कामेश्वर सिंह का निधन हुआ। पहले दो रानियाँ भी बाद के वर्षों में चल बसीं। तीन विवाहों के बावजूद महाराजा को कोई संतान नहीं हुई।
इतिहास अक्सर शाही वंशों को वंश विस्तार से जोड़कर देखता है, पर यहाँ कहानी उलट है— यहाँ विरासत रक्त से नहीं, कर्तव्य से आगे बढ़ी।
महारानी ने अपनी बड़ी बेटी की संतान कुमार कपिलेश्वर सिंह को ट्रस्ट का उत्तराधिकारी बनाया और जीवन भर धरोहर, संस्कृति और ऐतिहासिक संपत्तियों की रक्षा का भार अपने कंधों पर रखा।
दरभंगा राज और स्वतंत्रता आंदोलन—गांधी से कांग्रेस तक
यह भी जानने योग्य है कि दरभंगा राज का योगदान केवल युद्ध तक सीमित नहीं था। जब स्वतंत्रता आंदोलन अपने शुरुआती चरण में थी और महात्मा गांधी आर्थिक संकटों से जूझ रहे थे, तब कई शासकों ने आँखें फेर लीं, पर दरभंगा राज ने धन, साधन और प्रचार—तीनों से सहयोग दिया।
इतिहासकार आज भी मानते हैं कि इंडियन नेशनल कांग्रेस को शुरुआती वर्षों में टिकाए रखने में दरभंगा राज का योगदान निर्णायक था।
स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होना और बाद में युद्धकालीन दान देना—ये दोनों मिलकर दर्शाते हैं कि यह परिवार सत्ता से अधिक राष्ट्र की आवश्यकता समझता था।
94 वर्ष की उम्र में अंत—सिर्फ एक जीवन नहीं, एक परंपरा का अवसान
जब महारानी कामसुंदरी देवी ने अंतिम सांस ली, तब दरभंगा और पूरे मिथिलांचल में सिर्फ शोक नहीं था—एक लंबे युग की स्मृतियाँ जीवित थीं।
उनका अंतिम संस्कार राज परिसर में पारंपरिक विधि-विधान से हुआ। सुरक्षा, व्यवस्था और मौन— तीनों मिलकर इस दृश्य को वह गंभीरता दे रहे थे जो शायद आधुनिक समाज भूल चुका है।
दरभंगा राज का मधेश्वरनाथ परिसर वह ऐतिहासिक स्थान है जहाँ सदियों से राजपरिवार के महाराजा-महारानीयों का अंतिम संस्कार होता आया। यहाँ नौ मंदिर हैं—राजधर्म, सेवा और सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक।
आज के समय में जब इतिहास को या तो मिटाया जा रहा है या मनोरंजन में बदला जा रहा है, ऐसे स्थान स्मृति के साक्ष्य की तरह खड़े हैं।
रियासतें—दोषी या अनदेखे नायक?
स्वतंत्रता के बाद भारत ने रियासतों को अक्सर शोषण, वैभव और सामंती व्यवस्था के प्रतीक के तौर पर दिखाया। पर इतिहास का दूसरा पक्ष यह भी है कि कई रियासतों ने—
✔ विश्वविद्यालय बनवाए
✔ सड़कें बनवाईं
✔ अस्पताल दिए
✔ संस्कृति संरक्षित की
✔ और संकट में राष्ट्र को वित्तीय सहारा दिया
परंतु जनता की स्मृति में इन कार्यों को जगह नहीं मिलती क्योंकि पाठ्यपुस्तकों और विमर्शों ने उन्हें हमेशा खलनायक के रूप में चित्रित किया।
दरभंगा राज का युद्धकालीन दान, गांधी के संघर्ष में योगदान, सांस्कृतिक संरक्षण और धरोहरों का विकास—ये सब उस पक्ष को दर्शाते हैं जिसे इतिहास ने intentionally या unintentionally संकीर्ण कर दिया।
आज क्या बचा है?
महारानी कामसुंदरी देवी के निधन के बाद सवाल सिर्फ भावनात्मक नहीं, ऐतिहासिक भी है— क्या उनके बाद यह परंपरा जीवित रहेगी?
कुमार कपिलेश्वर सिंह वर्षों से ट्रस्ट और विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। पर इतिहास की रक्षा हमेशा आसान नहीं होती— जमीनें कब्जाई जाती हैं, धरोहरें बेची जाती हैं, और स्मृति मिटाई जाती है। दरभंगा राज की धरोहर भी इन चुनौतियों से अछूती नहीं।
आज मिथिलांचल में लोगों ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया, पर साथ ही गर्व भी— क्योंकि उनके साथ वह अध्याय जुड़ा था जिसमें भारत ने अपनी सैन्य और राजनीतिक अस्मिता के लिए शाही खजानों का सहारा लिया था।
Darbhanga Mahrani
अंत में—इतिहास का सवाल
जब भविष्य की पीढ़ियाँ यह पूछेंगी कि—
“1962 में जब भारत युद्ध लड़ रहा था, तब किसने साथ दिया?”
तो जवाब में सिर्फ सरकारें नहीं आएंगी, बल्कि दरभंगा जैसे राजघराने भी आएंगे जिन्होंने बिना आदेश, बिना कैमरा, बिना प्रचार— राष्ट्र को सर्वोपरि रखा।
महारानी कामसुंदरी देवी सिर्फ राजघराने की सदस्य नहीं थीं, वे उस परंपरा की प्रतिनिधि थीं जहाँ बलिदान को स्मारक नहीं चाहिए होता। उनके जाने से यह परंपरा भले कमज़ोर हो जाए, पर कहानी हमेशा जीवित रहेगी।
और इतिहास के पास यही एक ताकत है— न्याय देर से सही, पर देता जरूर है।
Source: onewshindi.com


