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अब नहीं होगी 10-मिनट डिलीवरी की रेस, श्रम मंत्रालय ने ब्लिंकिट-ज़ेप्टो को दिया निर्देश

भारत में 10 मिनट डिलीवरी मॉडल पर रोक। श्रम मंत्रालय ने डिलीवरी पार्टनर की सुरक्षा के लिए बड़ी कंपनियों से समय सीमा हटाने को कहा। ब्लिंकिट ने बदलाव शुरू किया।

अब नहीं होगी 10-मिनट डिलीवरी की रेस, श्रम मंत्रालय ने ब्लिंकिट-ज़ेप्टो को दिया निर्देश

अब नहीं होगी 10-मिनट डिलीवरी की रेस

delhi

3:56 PM, Jan 13, 2026

O News हिंदी Desk

अब 10 मिनट में नहीं मिलेगा ऑनलाइन सामान, सरकार का नया फैसला और गिग वर्कर्स की बड़ी जीत

भारत की ई-कॉमर्स इंडस्ट्री में लंबे समय से चली आ रही एक रेस अब खत्म होती दिख रही है। 10 मिनट में ग्रोसरी पहुंचाने की यह अंधी दौड़ आखिरकार सरकार की दखल के बाद रुक गई है। केंद्र सरकार ने डिलीवरी पार्टनर की सुरक्षा को पहली बार इस स्तर पर प्राथमिकता देते हुए बड़ा निर्णय लिया है, जिसने देश भर के गिग वर्कर्स और डिलीवरी बॉयज़ के बीच राहत की भावना पैदा कर दी है।

क्या है पूरा मामला?

पिछले कुछ वर्षों में “10 मिनट डिलीवरी” का ट्रेंड तेजी से बढ़ा। अचानक आया यह मॉडल इतना लोकप्रिय हुआ कि देश की तमाम बड़ी ऑनलाइन कंपनियाँ इसे अपने मार्केटिंग और ब्रांडिंग का मुख्य हथियार बना चुकी थीं। उपभोक्ताओं को फ्री में आदत पड़ गई कि “ऑर्डर किया और तुरंत दरवाजे पर मिल गया।”

लेकिन हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती। इस मॉडल के पीछे वे मजदूर, वे युवक थे, जिनकी बाइक तेज़ दौड़ती थी, और जिनकी सुरक्षा उस तेज़ गति के नीचे दब रही थी। वही गिग वर्कर्स जिनके पास न स्थाई नौकरी, न बीमा की सुरक्षा, और न किसी ट्रेड यूनियन की ताकत।

सरकार ने क्यों दखल दिया?

बड़ी वजह थी दुर्घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी, गिग वर्कर्स की हड़ताल, और सोशल मीडिया पर उभरती आवाजें, जिन्होंने सवाल उठाए— क्या सुविधा की कीमत किसी की जान हो सकती है?

इसी के बाद केंद्रीय स्तर पर सक्रियता बढ़ी और श्रम मंत्रालय ने इस मॉडल को लेकर बड़ी कंपनियों से बात की। सूत्रों के अनुसार श्रम मंत्रालय और संबंधित विभागों ने स्विगी, जोमैटो, ब्लिंकिट, जेप्टो जैसे एग्रीगेटर्स को स्पष्ट संकेत दिया कि डिलीवरी को लेकर इस तरह की समय सीमा स्ट्रीट लेवल पर दुर्घटनाओं को बढ़ा रही है और यह असुरक्षित कार्य संस्कृति बना रही है।

10 मिनट डिलीवरी पर रोक—क्या वाकई फैसला हुआ?

एक मीटिंग के बाद यह बात सामने आई कि सरकार ने डिलीवरी कंपनियों से 10 मिनट डिलीवरी समय सीमा हटाने का आग्रह किया है और कंपनियों ने इसके लिए सहमति भी दे दी है।

सूत्र बताते हैं:

  1. केंद्रीय श्रम मंत्री ने कंपनियों से सीधे बातचीत की
  2. कंपनियों को सुझाव दिया गया कि समय सीमा की अनिवार्यता हटाई जाए
  3. कंपनियों ने भरोसा दिया कि वे ब्रांडिंग व ऐप्स से ऐसे दावे हटाएँगी
  4. ब्लिंकिट ने सबसे पहले ब्रांडिंग बदलकर कदम उठा दिया है

अभी तक भारत में ऐसा पहली बार हुआ है कि सरकार ने गिग वर्कर्स की सुरक्षा को लेकर इस स्तर पर सीधा हस्तक्षेप किया हो।

गिग वर्कर्स की बड़ी हड़ताल—पर्दे के पीछे की कहानी

गौर करने वाली बात है कि 25 दिसंबर और 31 दिसंबर को देश के कई शहरों में गिग वर्कर्स ने हड़ताल की थी। मुख्य मुद्दे थे:

  1. कम पेआउट
  2. असुरक्षित कार्य वातावरण
  3. दुर्घटनाओं में बढ़ोतरी
  4. बीमा और हेल्थ कवर की कमी
  5. समय सीमा के दबाव में स्पीडिंग

गिग वर्कर्स बताते हैं कि उन्हें कई बार ऐसे मैप रूट और टाइमर दिए जाते हैं जो “मिनी रेस” की तरह चलते हैं। वक्त पर सामान न पहुँचाने पर कम रेटिंग और कम प्रोत्साहन मिलता है, जबकि जल्दी पहुँचाने पर बोनस—यह सीधा स्पीडिंग का इनडायरेक्ट दबाव बन जाता था।

दुर्घटनाओं की हकीकत—जमीन पर क्या हो रहा था

अस्पतालों के बाहर खड़े दोपहिया वाहनों और घायल युवा डिलीवरी पार्टनर्स की तस्वीरें सोशल मीडिया पर सामने आने लगी थीं। दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर, हैदराबाद और पुणे जैसे शहरों में असली हाल ये था कि शहर की ट्रैफिक भरी सड़कों में 10 मिनट में सामान पहुँचाना किसी जादू से कम नहीं बल्कि जोखिम भरी दौड़ थी।

अधिकारियों के अनुसार कई मामलों में डिलीवरी बॉय समय से पहले पहुँच भी जाता था, लेकिन उसकी बाइक, उसकी हड्डियाँ और उसकी जान इस व्यवस्था में कुचली जा रही थी। सबसे खतरनाक यह था कि ये लोग न रोजगार में दर्ज, न किसी लेबर कोड के तहत सुरक्षित, और न किसी बीमा की अनिवार्यता में थे।

सरकार का नया एप्रोच—सेफ्टी फर्स्ट

अब सरकार ने साफ कर दिया है कि:

उपभोक्ताओं की सुविधा महत्वपूर्ण है, लेकिन मजदूर की सुरक्षा उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है।

इसी दिशा में यह फैसला सिर्फ एक निर्णय नहीं बल्कि आने वाले समय में गिग इकॉनमी रेगुलेशन की तरफ बढ़ता कदम भी माना जा रहा है।

फैसले में कंपनियों का रिस्पांस कैसा रहा?

सरकार के सुझाव के बाद ब्लिंकिट ने तुरंत अपनी टैगलाइन बदल दी। पहले वह कहती थी:

“10 मिनट में 10,000+ प्रोडक्ट डिलीवर।”

अब बदलकर यह हो गया:

ध्यान दीजिए—यहाँ स्पीड नहीं, वैराइटी और सुविधा पर जोर दिया गया है। यह बदलाव बेहद रणनीतिक है और इसके दो संकेत हैं:

  1. कंपनियाँ समय सीमा के दवाब को कम करेंगी
  2. ब्रांडिंग में तेज़ी की बजाय स्थायित्व को प्राथमिकता देंगी

ये बदलाव केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं रहेंगे। मीटिंग में मौजूद अन्य कंपनियों के भी आने वाले हफ्तों में ब्रांड भाषा बदलने की उम्मीद है।

उपभोक्ताओं पर क्या असर पड़ेगा?

कई उपभोक्ता पूछ सकते हैं— “अब क्या 10 मिनट में सामान नहीं मिलेगा?”

असल में दो बातों को समझिए:

  1. प्रतिबंध डिलीवरी पर नहीं, डेडलाइन पर है
  2. यानी यदि नजदीक स्टोर और कम ऑर्डर हो तो 10 मिनट में मिल भी सकता है
  3. लेकिन कंपनियाँ अब गारंटी या विज्ञापन में यह दावा नहीं करेंगी

इससे जनता को आखिर मिलेगा क्या?

  1. सुरक्षित डिलीवरी पार्टनर
  2. समय पर लेकिन बिना रेस के डिलीवरी
  3. मानव लागत कम
  4. एक स्वस्थ और टिकाऊ ऑनलाइन इंडस्ट्री

गिग वर्कर्स ने क्या जीता?

गिग वर्कर्स की इस जीत को तीन हिस्सों में समझें:

1. मानसिक सुरक्षा अब स्पीड के दबाव में दुर्घटनाएँ कम होंगी।

2. सामाजिक मान्यता पहली बार सरकार ने खुलकर गिग वर्कर्स की समस्याओं को स्वीकार किया।

3. भविष्य का रास्ता संभव है कि आने वाले समय में:

  1. बीमा
  2. हेल्थ कवर
  3. रोजगार सुरक्षा
  4. पेमेंट सुरक्षा

जैसे मुद्दों पर भी नीतियाँ बने।

नीति स्तर पर क्या बदल सकता है?

यूरोप और अमेरिका में गिग वर्कर्स को लेकर बहुत बहस चल रही है— कुछ देशों में उन्हें कर्मचारी (Employee) दर्जा मिला है, कुछ में स्वतंत्र ठेकेदार (Freelancer)।

भारत में यह बहस अब शुरू हो चुकी है कि:

  1. क्या उन्हें EPFO मिलेगा?
  2. क्या उन्हें हेल्थ कवर मिलेगा?
  3. क्या दुर्घटना बीमा अनिवार्य होगा?

10 मिनट डिलीवरी की रोक उसी बदलाव का पहला संकेत है।

निष्कर्ष—किसी की जान से बड़ा कोई उत्पाद नहीं

इस निर्णय को केवल “डिलीवरी मॉडल का बदलाव” न समझें। यह भारत में कामगारों की सुरक्षा, नीति निर्माण और कॉर्पोरेट उत्तरदायित्व का नया अध्याय है।

सरकार ने यह संदेश दिया है कि:

“ग्राहक राजा है, लेकिन मजदूर गुलाम नहीं।”

आज का भारत केवल तेज़ डिलीवरी के पीछे भागने वाला देश नहीं है, बल्कि ऐसा भारत है जो अपने श्रमिकों को देख रहा है, समझ रहा है और पहली बार उनके लिए नीतियाँ बना रहा है।

सवाल यही है— क्या अन्य देश भी भारत से सीखेंगे? और क्या भारत गिग इकॉनमी का रोल मॉडल बनेगा?

समय इसका जवाब देगा, लेकिन इतना तय है कि भारत की ई-कॉमर्स इंडस्ट्री में आज एक ऐतिहासिक मोड़ लिखा गया है।

Source: TV9

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