मंदिर-गुरुद्वारे में जाने से इनकार… सेना से बर्खास्त लेफ्टिनेंट ! आखिर कौन हैं वो और क्यों बढ़ा देशभर में विवाद?
भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट सैमुअल कमलेसन को मंदिर और गुरुद्वारे में प्रवेश से इनकार करने पर बर्खास्त किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला बरकरार रखा। पूरा मामला जानें।

मंदिर और गुरुद्वारे में प्रवेश से इनकार, सेना ने किया बाहर…
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3:48 PM, Nov 28, 2025
O News हिंदी Desk
मंदिर और गुरुद्वारे में प्रवेश से इनकार, सेना ने किया बाहर… कौन हैं लेफ्टिनेंट सैमुअल कमलेसन? समझिए पूरा मामला विस्तार से
Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में भारतीय सेना के अधिकारी लेफ्टिनेंट सैमुअल कमलेसन को सेवा से बर्खास्त करने के फैसले को सही ठहराते हुए एक ऐसा निर्णय दिया है, जिसने पूरी देशभर में धार्मिक आस्था बनाम सैन्य अनुशासन पर नई बहस छेड़ दी है। मामला बेहद संवेदनशील है—एक तरफ हैं एक सैनिक की व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताएँ, और दूसरी तरफ सेना का कठोर अनुशासन, एकरूपता और रेजिमेंटल परंपराएँ। अदालत के फैसले के बाद राजनीतिक हलकों से लेकर सोशल मीडिया तक चर्चा तेज हो गई है कि क्या व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता सेना के नियमों से ऊपर रखी जा सकती है?
इस पूरे विवाद के केंद्र में हैं लेफ्टिनेंट सैमुअल कमलेसन, जिन्हें साल 2021 में सेवा से बाहर कर दिया गया था। आइए विस्तार से समझते हैं पूरा घटनाक्रम, पृष्ठभूमि और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का महत्व।
कौन हैं लेफ्टिनेंट सैमुअल कमलेसन?
लेफ्टिनेंट सैमुअल कमलेसन भारतीय सेना के एक युवा अधिकारी थे, जिन्हें मार्च 2017 में लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्त किया गया था। उन्हें भारत की प्रतिष्ठित और गौरवशाली यूनिट थर्ड कैवलरी रेजिमेंट में नियुक्त किया गया था, जो मुख्यतः जाट, राजपूत और सिख समुदाय के जवानों से मिलकर बनी है।
रेजिमेंट के भीतर दो बातें बहुत अहम होती हैं—
- रेजिमेंटल परंपराओं का पालन
- धार्मिक संरचनाओं में समान रूप से भागीदारी
इस परंपरा के तहत यूनिट के सभी जवान और अधिकारी मंदिर, गुरुद्वारे या रेजिमेंटल धार्मिक स्थलों पर होने वाली परेड और पूजा-अनुष्ठानों में शामिल होते हैं।
कमलेसन को सिख स्क्वाड्रन बी में ट्रूप लीडर बनाया गया था। इसी दौरान विवाद शुरू हुआ।
मंदिर और गुरुद्वारे में प्रवेश से इनकार – विवाद की असली वजह
बताया जाता है कि लेफ्टिनेंट कमलेसन ने नौकरी जॉइन करने के कुछ समय बाद ही अपने वरिष्ठ अधिकारियों से यह अनुरोध किया कि—
“मैं एक प्रोटेस्टेंट ईसाई हूँ, और मेरा धर्म मुझे गैर-ईसाई पूजा स्थलों के गर्भगृह में जाकर पूजा करने की अनुमति नहीं देता।”
उन्होंने मंदिर और गुरुद्वारे में प्रवेश कर धार्मिक अनुष्ठान में शामिल होने से इंकार कर दिया।
यह पहली बार नहीं है कि सेना में किसी जवान या अधिकारी ने व्यक्तिगत धार्मिक कारणों से छूट मांगी हो, लेकिन रेजिमेंटल परंपरा में अक्सर छूट नहीं दी जाती, क्योंकि इससे यूनिट की एकजुटता पर असर पड़ता है।
सूत्रों के अनुसार—
- उन्हें कई बार समझाया गया
- विकल्प सुझाए गए
- रेजिमेंट के नियम स्पष्ट रूप से बताए गए
लेकिन कमलेसन अपनी धार्मिक मान्यता पर अडिग रहे।
सेना का रुख – “अनुशासन सर्वोपरि”
भारतीय सेना के पास दुनिया का सबसे कड़ा अनुशासन ढांचा है। उनका मानना है कि:
- यूनिट की एकता
- धार्मिक सौहार्द
- रेजिमेंटल रीति-रिवाज
इन सबका पालन हर सैनिक के लिए अनिवार्य है।
सेना के अनुसार—
- कमलेसन का आदेश न मानना "अवज्ञा" की श्रेणी में आता है
- इससे स्क्वाड्रन में अनुशासनात्मक असंतुलन पैदा हो सकता था
- एक अधिकारी होने के नाते उनसे उदाहरण प्रस्तुत करने की अपेक्षा थी
इन्हीं कारणों से अनुशासन भंग करने के आरोप में 2021 में उन्हें बर्खास्त कर दिया गया।
सेना से बर्खास्तगी, पेंशन और लाभ भी खत्म
कमलेसन को न केवल सेवा से हटाया गया बल्कि—
- पेंशन पात्रता
- ग्रेच्युटी
- अन्य रिटायरमेंट बेनेफिट्स
सब कुछ रद्द कर दिया गया।
इसके बाद उन्होंने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया और अपनी बर्खास्तगी को चुनौती देते हुए कहा कि—
“मेरी धार्मिक स्वतंत्रता का हनन किया गया है। मुझे मेरे धर्म के विपरीत करने के लिए मजबूर किया गया।”
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने सेना के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा:
- सेना का अनुशासन सर्वोच्च है
- सेवा में रहते हुए व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता सीमित हो सकती है
- रेजिमेंटल परंपराएँ सेना की एकता का आधार हैं
- एक अधिकारी द्वारा आदेश न मानना पूरी यूनिट पर गलत असर डाल सकता है
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि—
“धार्मिक अधिकार महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन सेना की संरचना में उन्हें पूर्ण रूप से लागू नहीं किया जा सकता।”
यह निर्णय आने के बाद कई राजनीतिक दलों ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में बहस का मुद्दा बना दिया है।
क्या सेना धर्म थोपती है? समझें रीयलिटी
कुछ लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या सेना किसी सैनिक पर धर्म थोपती है? इसका तथ्यात्मक जवाब है—नहीं।
- भारतीय सेना धर्मनिरपेक्ष सिद्धांत पर काम करती है
- किसी सैनिक को किसी धर्म को मानने या न मानने के लिए मजबूर नहीं किया जाता
- लेकिन रेजिमेंटल परंपराओं में हिस्सा लेना "धर्म" नहीं बल्कि "यूनिट की संस्कृति" का हिस्सा माना जाता है
इसीलिए अदालत ने भी माना कि यह मामला "धर्म पर जोर" नहीं बल्कि "अनुशासन और परंपरा" का मामला था।
क्या यह फैसला भविष्य में भी उदाहरण बनेगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय सैन्य संरचना और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच एक उदाहरण स्थापित करेगा। अब सेना में ऐसे मामलों में निर्णय लेने के लिए यह एक मिसाल के तौर पर देखा जाएगा।
कुछ महत्वपूर्ण बिंदु—
- धार्मिक स्वतंत्रता पर सीमाएँ सैन्य सेवा में और स्पष्ट होंगी
- सेना को अपने ढांचे में धार्मिक विविधता को और संवेदनशीलता से संभालना होगा
- सैनिकों को प्रशिक्षण के दौरान रेजिमेंटल परंपराओं की जानकारी पहले ही देना शायद अनिवार्य कर दिया जाए
क्या कमलेसन को दोबारा सर्विस में लौटने का मौका मिलेगा?
सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद अब उनके लिए विकल्प बहुत सीमित हैं—
- फिर से सेवा में वापसी का मौका लगभग खत्म
- वित्तीय लाभ प्राप्त करने की संभावना भी नहीं
- उनकी बर्खास्तगी अब अंतिम रूप से तय मानी जाएगी
हालांकि वे समीक्षा याचिका दायर कर सकते हैं, लेकिन कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि फैसला बदलने की संभावना बेहद कम है।
आखिरकार यह मामला क्या संदेश देता है?
लेफ्टिनेंट कमलेसन का मामला यह दर्शाता है कि—
- सेना में अनुशासन व्यक्तिगत आस्था से ऊपर होता है
- रेजिमेंटल एकता को किसी भी कीमत पर बनाए रखना जरूरी है
- धार्मिक स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन सैन्य कर्तव्य के दौरान इसकी सीमाएँ तय हैं
एक लोकतांत्रिक देश में यह बहस जारी रहना स्वाभाविक है कि किस सीमा तक एक सैनिक अपने व्यक्तिगत धार्मिक अधिकारों का प्रयोग कर सकता है। लेकिन अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि सेना के भीतर सभी से एक ही अनुशासन की अपेक्षा की जाती है।
Source: NBT


