महिला खतना पर सुप्रीम कोर्ट सख्त! न कुरान में जिक्र, न इस्लाम की शर्त… फिर कौन थोप रहा है यह दर्दनाक प्रथा?
सुप्रीम कोर्ट ने दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना पर केंद्र से जवाब मांगा। न कुरान में जिक्र, न धार्मिक अनिवार्यता—तो क्यों जारी है यह विवादित प्रथा?

महिला खतना पर सुप्रीम कोर्ट सख्त!
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12:47 PM, Nov 29, 2025
O News हिंदी Desk
महिला खतना पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: न कुरान में उल्लेख, न इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा… फिर क्यों जारी है यह प्रथा? केंद्र सरकार से मांगा जवाब
भारत में लंबे समय से चर्चा में रहने वाली महिला खतना या फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM) की प्रथा एक बार फिर कानूनी बहस के केंद्र में है। सुप्रीम कोर्ट ने दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित इस परंपरा के खिलाफ दायर याचिका पर गंभीरता दिखाते हुए केंद्र सरकार, कानून मंत्रालय और संबंधित संस्थाओं से औपचारिक जवाब तलब किया है। यह मामला बच्चों के संवैधानिक अधिकार, शारीरिक अखंडता और मानवाधिकारों से सीधे जुड़ा हुआ है, जिसे देश की सर्वोच्च अदालत अब प्राथमिकता से सुनने के लिए तैयार है।
याचिका का तर्क: यह न इस्लाम की अनिवार्य परंपरा, न कुरान में इसका कोई जिक्र
एनजीओ चेतना वेलफेयर सोसायटी की ओर से दायर इस याचिका में कहा गया है कि महिला खतना इस्लाम का मूल या अनिवार्य हिस्सा नहीं है। इस दावे को मजबूत करने के लिए याचिका में कुरान के अध्यायों और धार्मिक विद्वानों के मतों का हवाला दिया गया है, जिनमें स्पष्ट रूप से बताया गया कि इस प्रथा को इस्लामी धार्मिक कर्तव्यों में शामिल नहीं किया गया है।
दिलचस्प बात यह है कि दुनिया भर के कई इस्लामी देशों और विद्वानों ने भी स्वीकार किया है कि FGM इस्लामिक अनिवार्यता नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक प्रथा है जो समय के साथ कुछ खास समुदायों में प्रचलित हो गई। इसके बावजूद भारत में आज भी हजारों बच्चियों पर इसे परंपरा के नाम पर लागू किया जाता है।
न्यायालय का रुख: बच्चों के अधिकार सर्वोपरि
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यह मामला केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता का नहीं, बल्कि बच्चों के संवैधानिक अधिकारों और उनके मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य से गहराई से जुड़ा है। इसलिए अदालत इसे अत्यधिक संवेदनशील विषय मानकर सुनवाई आगे बढ़ाएगी।
याचिकाकर्ता पक्ष की वरिष्ठ अधिवक्ता शशि किरण और साधना संधू ने कोर्ट के सामने तर्क दिया कि यह प्रथा न केवल गैर-वैज्ञानिक है, बल्कि लड़कियों को जीवनभर चलने वाली शारीरिक और मानसिक पीड़ा भी दे जाती है। FGM के कारण होने वाले दर्द, संक्रमण, प्रसव जटिलताओं और मानसिक ट्रॉमा का उल्लेख करते हुए उन्होंने इसे तत्काल प्रतिबंधित करने की मांग की।
WHO और संयुक्त राष्ट्र पहले ही जता चुके हैं गहरी चिंता
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियाँ कई वर्षों से इस प्रथा के खिलाफ वैश्विक अभियान चला रही हैं। WHO ने स्पष्ट कहा है कि:
- FGM का कोई चिकित्सीय लाभ नहीं है,
- यह बाल अधिकारों और महिलाओं के मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन है,
- और यह दुनिया भर में लड़कियों के जीवन के लिए एक स्थायी खतरा है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसंबर 2012 में FGM को समाप्त करने का प्रस्ताव भी सर्वसम्मति से पारित किया था, जिसके तहत सभी देशों को इस प्रथा के खिलाफ सख्त क़ानून बनाने की सलाह दी गई थी।
भारत में कानून अस्पष्ट, स्वतंत्र प्रतिबंध मौजूद नहीं
भारत में FGM को सीधे तौर पर प्रतिबंधित करने वाला कोई स्वतंत्र कानून मौजूद नहीं है। हालांकि, भारतीय दंड संहिता (BNS) की कई धाराएँ — जैसे 113, 118(1), 118(2) और 118(3) — किसी भी प्रकार की जानबूझकर की गई शारीरिक क्षति को अपराध मानती हैं। इसके अलावा POCSO एक्ट बच्चों के जननांगों से संबंधित किसी भी प्रकार की गैर-चिकित्सकीय छेड़छाड़ को अपराध की श्रेणी में रखता है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कानून पहले से मौजूद है, लेकिन स्पष्ट प्रतिबंध न होने के कारण यह प्रथा रोकने में कठिनाई होती है। अदालत से गुहार है कि वह इस विषय पर केंद्र सरकार को कड़ा कानून लाने का निर्देश दे।
दाऊदी बोहरा समुदाय: क्यों यहाँ अधिक प्रचलित है खतना?
भारत में FGM मुख्य रूप से दाऊदी बोहरा समुदाय में खतना के नाम से प्रचलित है। याचिका के अनुसार इस समुदाय की लगभग 75% महिलाएँ इसे आज भी अपनी बेटियों पर लागू करवाती हैं। यह प्रथा पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक मान्यताओं का हिस्सा मानी जाती है, हालांकि कुरान इसका समर्थन नहीं करता।
समुदाय के कुछ समूह इसे धार्मिक परंपरा बताते हैं और मानते हैं कि यह उनकी पहचान का हिस्सा है, जबकि कई बोहरा महिलाएँ खुद इस प्रथा के खिलाफ आवाज उठा चुकी हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी कई बोहरा महिला संगठनों ने इसे अमानवीय बताते हुए इसके खिलाफ अभियान चलाए हैं।
प्रथा के खतरनाक प्रभाव: जीवनभर रह सकता है दर्द
चिकित्सीय शोधों और WHO के आंकड़ों के अनुसार FGM के मुख्य खतरों में शामिल हैं:
- अत्यधिक दर्द और रक्तस्राव
- संक्रमण और बाँझपन का खतरा
- सेक्सुअल हेल्थ पर गंभीर प्रभाव
- प्रसव के दौरान जटिलताएँ
- दीर्घकालिक मानसिक आघात (ट्रॉमा)
कई पीड़ित महिलाएँ बताती हैं कि उन्हें बचपन में हुए इस दर्द की याद जिंदगीभर पीछा करती है। कई महिलाओं ने कहा कि यह अनुभव इतना भयावह था कि वे दोबारा अपने बच्चों के लिए यह प्रथा सोच भी नहीं सकतीं।
दुनिया के कई देशों में पहले ही प्रतिबंध
अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूरोप एवं अफ्रीका के कई देशों में FGM पूरी तरह बैन है। इन देशों में न केवल इस प्रथा को अपराध घोषित किया गया है, बल्कि दोषियों को कड़ी सजा भी दी जाती है। भारत में यह प्रथा बेहद सीमित समुदाय में ही मौजूद है, इसलिए इसे रोकना अन्य देशों की तुलना में कहीं आसान हो सकता है — यदि कानून स्पष्ट हो।
केंद्र सरकार का रुख अब सबसे अहम
सुप्रीम कोर्ट ने अब केंद्र सरकार, कानून मंत्रालय और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को नोटिस भेजकर पूछा है कि:
- क्या भारत में FGM को रोकने के लिए कोई स्वतंत्र कानून बनाया जा सकता है?
- क्या वर्तमान कानूनों के तहत इस प्रथा को अपराध घोषित किया जा सकता है?
- और सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर अपना आधिकारिक रुख कब तक स्पष्ट करेगी?
सरकार का जवाब आने के बाद मामला और तेज़ी से आगे बढ़ेगा। न्यायालय का यह कदम FGM जैसी पुरानी और विवादित प्रथा पर निर्णायक हस्तक्षेप की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
मुद्दे की जड़: परंपरा या गलत आग्रह?
पिछले कुछ वर्षों में बोहरा समुदाय के भीतर ही दो तरह की आवाजें उठी हैं — एक जो इसे अपनी धार्मिक परंपरा मानकर बचाव करती हैं, और दूसरी जो इसे पुरानी, अमानवीय और महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ प्रथा बताकर समाप्त करने की मांग करती हैं।
बहुत से इस्लामी विद्वान बताते हैं कि FGM इस्लाम की मूल शिक्षा के खिलाफ है क्योंकि इस्लाम महिलाओं की गरिमा, सम्मान और शारीरिक सुरक्षा को सर्वोच्च दर्जा देता है। कुरान में इसका कोई जिक्र न होना भी यही संकेत देता है कि यह धार्मिक से अधिक सांस्कृतिक प्रथा है, जिसे समय के साथ सुधार की जरूरत है।
अदालत की अगली सुनवाई अब बेहद महत्वपूर्ण
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद देश की नजर अब केंद्र सरकार के रुख पर है। क्या भारत भी उन देशों की सूची में शामिल होगा, जिन्होंने FGM को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया? बच्चों के अधिकार और महिलाओं की गरिमा को ध्यान में रखते हुए कोर्ट किस दिशा में निर्णय लेगा — यह आने वाले समय में साफ होगा।
एक बात तो निश्चित है: महिला खतना पर राष्ट्रीय बहस अब तेज होने वाली है, और यह फैसला आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा और सम्मान को सीधे प्रभावित करेगा।
Source: News 18


